Monday, September 3, 2012
पृथ्वीपुत्र -शिवकुमार झा ‘टिल्लू’
अतिक्रमण सबल व्यक्ति वा समूहक अमानुषिक प्रवृति रहल अछि। वैज्ञानिक मान्यताक अनुसारे सेहो अस्तित्वक लेल संघर्ष आ ओइ संघर्षमे योग्यतमक उत्तरजीविता कालक्रममे होइ रहल अछि। जखन सम्पूर्ण सृष्टिमे बौद्धिक चेतनासँ युक्त मानव अस्तित्वक लेल बेवस्थाक विरूद्ध संघर्ष केवल तखन मिथिलाक माटि-पानि कोना अछोप रहए।
समाजक ऊँच-नीच आ जय-पराजयक वृत्ति-चित्रक रूपेँ ललितेश मिश्र ललित जीक उपन्यास पृथ्वी-पुत्र पुस्तकाकार सन् 1965 ई.मे प्रकाशित भेल। जेना की आमुखमे स्वयं उपन्यासकार लिखने छथि जे ई उपन्यास हंसराज जीक तगेदामे लिखल गेल, तँए ऐमे रचनाकारक सम्पूर्ण आत्मीयता देखब भ्रामक सिद्ध हएत। हमरा सबहक संग ई दुर्भाग्य रहल जे आत्मिक भाषामे रचनाकार अपन आशुत्वसँ बेशी तगेदाक कारणेँ रचना करैत रहलाहेँ।
रचनाक कारण जे हुअनि मुदा एतबा तँ अवश्य प्रासांगिक आ मैथिली साहित्यक लेल वरदान मानल जाए जे पृथ्वीपुत्र उपन्यासक माध्यमसँ उपन्यसकार मिथिलाक माटि-पानिमे समाहित सभसँ अंतिम वर्गक समाज धरि पहुँचि गेल छथि जे सोझ मानसिक प्रवृत्तिक द्योतक अछि। ओना ललितक कथा “रमजानी” सेहो समाजक दलित वा पछड़ल लोकक वृत्तिचित्र थिक। स्वाभाविके छैक रचनाकार प्रशासनिक सेवामे रहल छथि,, समाजक ऊँच-नीच कृत्य-कुकृत्य आ वर्गक विषमताक दर्शन बरोबरि होइत हेतनि तँए अपन दैनन्दिनीक अनुभवकेँ कल्पनाक सरोवरिमे बोरि यथार्थवादी रूप देबाक प्रयास कएलनि जइमे अंशत: सफल सेहो भेलाह।
उपन्यासक गाथा व्यावसायिक चलचित्र जकाँ मध्यसँ प्रारंभ होइत अछि। घटनाक गर्त्तमे गेलासँ ई उपन्यास दलित समाजमे सामन्तवादी शोषणक विरूद्ध वर्ग संघर्षक चलचित्र थिक।
जंगी पासवानक पुत्र विसेखी पासवान कर्मसँ वैड-कैरेक्टरक चोर अछि। जकरा अपन दुनू पुत्र गेनालाल आ सरूपसँ बेशी अपन शिष्य छतरपर विश्वास छैक। गेनालाल जेकरा गेनमा कहल जाइछ ओकर चरित्र भकलोल-मनुख मुदा कर्मशील मजूरक छैक। सरूप ऐ उपन्यासक नायक थिक। जकरा कतौ उपन्यासकार दलित समाजक क्रांति-वीर वनएबाक प्रयास करैत छथि तँ कतौ अपन बहिन बिजलीक कल्पनाथ मिश्र उर्फ कलपू मिश्रक संग अनैतिक सिनेहक प्रोत्साहक वा साक्षी। सरूपक चित्रक ई अर्न्तद्वन्द्व दलित समाजक जीवन शैलीमे विराधाभास मानल जाए। गेना लालक अर्द्धागिनी बेनी अपन पतिक मृत्युक पश्चात् पारिवारिक सहमति आ उत्तरदायित्वक कारणे अपन देओर सरूपसँ बिआह कऽ लैत अछि। उपन्यास गाथाक विचित्र पात्र छथि बिजुली वा बिजो बिजुरी आ बिजुरिया सन छद्म नामसँ विभूषित बिसेखी पासवानक कन्या “बिजली”। कौमार्यक आंगनमे प्रवेश करिते बिजलीकेँ गामक पंडित कुलमे जनमल कल्पनाथ मिश्रसँ प्रेम भऽ जाइत अछि। कलपू मिसर विवाहित छथि मुदा पहिल प्रसव पीड़ाक क्रममे हिनक कनियाँक देहान्त भऽ गेलनि। ऐ अनर्गल आ िनष्कर्ष रहित प्रेमक आभास दलित समाजकेँ लागि जाइत अछि। फलत: रेलवेमे पेटमेन हीरालालसँ बिजलीक बिआह कऽ देल गेल। रीति-प्रीति आरंभे कालसँ साहित्यक महत्वपूर्ण बिन्दु रहल छैक। ओइ मार्गदर्शनपर आगाँ बढ़ैत ललित जी उपन्यासमे आकर्षणक सोमरस घोरबाक प्रयास करैत ऐ विचित्र पात्राकेँ ऐमे समाहित कएलनि। दू-तीन बेरि पेटमेन हीरा लालक सानिध्यसँ बिजली पड़ा कऽ गाम आबि गेलीह। मान-मनोबलक बाद फेर पतिक क्वाटरमे गयलाक बाद कोयला सन धुरधुर घऽर आ बऽर नीक नै लगलनि। हीरा लालकेँ बिजलीक चरित्रक वास्तविकताक भान भऽ जाइत अछि। पुरुष सभ किछु बर्दास्त कऽ सकैत अछि मुदा अपन दाराकेँ दोसर पुरुषक सन आत्मिक वा दैहिक वरण पुरुषक लेल घोंटव असंभव। बिजलीक प्रति हीरा लालक व्यवहार कर्कश भऽ जाइत अछि।
अंतिम परिणति भेल जे बिजली सभ दिनक लेल नैहर आबि गेली। हीरा लाल पुनि आएल मुदा ओकरा चरित्रपर खलनायिका बिजली लांछना लगेबाक लेल सरुपकेँ उत्साहित केलक। गामक मानिजन अर्थात् जतिया राजा काी दासक अंतिम िनर्णय भेल जे बिजली आब हीरा लाल संगे नै जेतीह। ओना समाजक सभ पंच एकमत छलाह जे बिजलीक पुर्नविवाह कराओल जाए, मुदा जखन रचनाकार मात्र उपन्यासक आकर्षक लेल ऐ चरित्रक िनर्माण कएने छथि तँ क्रांतिक आश असंभव। कल्पनाथ मिश्र आ बिजलीक सिनेह पत्रहीन नग्न गाछ जकाँ मानल जाए जकर अस्तित्व नै। एक दिस जखन सरूप पुछैत अछि बिजलीसँ-
“पाहुन मोन पड़लौ की....?” तँ बिजलीक उत्तर दार्शनिक जकाँ भेटल तँ दोसर दिस बिजली कलपू मिसर द्वारा दोहरि मोड़ि कऽ देबए काल बलजोरी शब्द सुनि बजैत अछि- तोरा संग कुश्तम पटकममे डाँड़ तँ नै हएत हमरा....।
ई सिनेह कोन तरहक मानल जाए ई िनर्णए करब सर्वथा असंभव।
उपन्यासगाथामे कथाक्रमानुसारे विकराल वर्ग संघर्ष देखार होइत अछि। सर्वे एलाक बाद गरीबक जमीन कागतपर तँ आपिस होइत अछि मुदा जंग बहादुर सिंह सन जमीन्दार दुसाध आ मुसहर समाजकेँ जमीन देबाक लेल तैयार नै अछि। वर्ग संघर्ष करबाक लेल सरूप उद्यत भेल। सरूपक दलमे जजाति कटबाक लेल गेनालाल सन माटिक पूत मात्र छल। जंग बहादुरक हँसेरीदल लोहा सिंहक नेतृत्वमे सरूपपर हमला कऽ देलक। अनुजकेँ वचेबाक क्रममे गेनमा मारल गेल। ऐ वर्ग संघर्षक अंत औचित्वहीन लगैत अछि। सन् 1965 ई.मे भारत आजाद भऽ गेल छल। तखन दलित समाजक एकटा माटिक लाल सामन्तवादी तत्वक आगाँ लुप्त भऽ गेल आ जंगबहादुर सन सामन्तीक ओइठाम पुलिस पहुँचल नै हएत...। ई अत्यन्त हास्यास्पद लगैत अछि। जौं ऐ तरहक घटना भेलो हएत तैयो उपन्यासकारकेँ ऐमे क्रांति अनबाक प्रयास करबाक छलनि। साम्यवादी लेखनीसँ िनकसल उपन्यासक अंश अत्यन्त िनर्बल मानल जाए।
ऐ घटनासँ पूर्व बिजलीक चरित्रपर आधात दुर्योधन सिंह सन सिपाही करैत अछि। ओकरा सरूप काटि दैत अछि। पुत्रकेँ जेहलसँ बचएबाक लेल बिसेखी सभ दोख अपना ऊपर लऽ जहल चलि जाइत अछि जइठाम संग्रहणी सन बेमारीसँ ओकर मृत्यु भऽ गेल।
बिसेखीक चरित्रक काल-क्रमानुसार परिवर्त्तन उपन्यासक सबल पक्ष मानल जाए। पहिने जखन चोर छल तँ ओकरा किछु नै भेल आ जखन किछु नै केलक तँ पुत्रमोह आ पारिवारिक मर्यादाक कारणेँ सजा भेटल। बी.सी. कैरेक्टरक चोरसँ मुक्ति पाबए लेल कलक्टरक आगाँ सप्पत खेने छल। ओइ सप्पत खेबामे घुरन दुसाध, मंडर पाण्डे, खख्खन जट्ट, रौदी खलीफा आ बुच्ची झा सन चोर सेहो छल। उपन्यासकार द्वारा चोरक नाम चयन करबामे ई स्पष्ट भऽ गेल चोरक कोनो जाति नै होइत छैक, समाजक अग्र आसन बैसैबला लोककेँ सेहो कुकर्मी समाजमे स्थान छन्हि। ई उपन्यासकारक समन्वयवादी सोच मानल जाए।
आब बिसेखीक परिवारमे पुरुष पात्रक रूपमे बचैत अछि- सरूप। सरूपकेँ ललित पृथ्वीपुत्र बनेबाक कोनो अबसरि नै छोड़ैत छथि। ऐ उपन्यासक ओ वास्तविक नायक अछि। अपन पिताकेँ चोरि नै करबाक सप्पत खाइत काल लड़खड़ाइत देखि ओ क्रोधित भऽ जाइत अछि। ओकरा चोरि करब कथमपि पसिन्न नै। जंगबहादुरकेँ ललकारि जजाति काटि लेबाक उपक्रममे शोषित समाजक ओ “क्रांतिवीर” बनि जेबाक लेल उद्यत अछि। बहिनक आँचरपर दुर्योधन सिंह सन सिपाहीक हाथ देखि ओकर हत्या कऽ केलक। सरूप कर्मवादी सत्पुरुष अछि। जाधरि बेनीकेँ सरूपक माय एकर अंक नै लगलन्हि ताधरि ओइ भाउजमे सरूप मात्र श्रद्धापूर्वक मातृत्व रूप देखलक। ऐ दलित समाजक आदरणीय पात्रकेँ ललित एकठाम कलंकी चरित्र बना देलनि। कल्पनाथ मिसरक अनर्गल सिनेहसँ बँधलि बिजलीकेँ सरूप आत्मसात केना केलक। एकठाम भाउजिक विषक्त हँसी आ व्यंग्यवाणसँ आकुल भऽ सरूप बिजलीपर क्रोध तँ करैत अछि मुदा सम्पूर्ण उपन्यासमे कलपू मिसरक प्रसंगमे पृथ्वीपुत्र चुप्प रहि गेल। सिनेह कोनो अपराध नै, कियो केकरोसँ कऽ सकैत अछि, मुदा ऐ सिनेहक कोनो निष्कर्ष नै। सरूप सन सोझ मानसिकताक पुरुष ऐ अनर्गल सिनेहकेँ केना समर्थन देलक। बिजली ठाम-ठाम औचित्यहीन सिनेही जकाँ बेनीसँ अपन प्रेमकेँ सबलता प्रदान करबाक लेल निरर्थक संवाद करैत अछि। ऐसँ इहए प्रमाणित होइछ जे ऐ नारीकेँ अपन माता-पिता आ भाइक मर्यादाक कोनो बोध नै। तखन एकठाम महान दार्शनिक जकाँ बिजलीकेँ दृष्टि पटलपर राखब उपन्यासकारक अदूरदर्शिता छन्हि। जखन कलपू मिसर अपन माइक राखल अभरन बिजलीकेँ पहिरबाक अनुरोध करैत अछि तँ ओ बजैत अछि जे-
“ओ गहना पहिरब तँ हम जरि जाएब। जखन बिजली एतेक बुद्धिमती महिला अछि तँ अपन मान-मर्यादा अपन बाप-पुरूखाक द्वारा बनाओल बेवस्था अर्थात् पाणिग्रहण संस्कार द्वारा वरणेय हीरालालकेँ किअए छोड़ि देलक। ई निश्चित रूपे जातीय संकीर्णतासँ बान्हल उपन्यासकारक व्यक्तिगत अनर्गल सोच छन्हि।”
जौं ऐ उपन्यासमे वर्ग-संघर्ष देखाएब यथार्थबोध मानल जाए तैयो ऐमे कमजोरी अछि। वर्ग संघर्षमे हत्या आ ओइ हत्याक बाद केनिहारकेँ कोनो सजा नै, अत्यन्त िनर्बल पक्ष थिक। कलपू मिसर आ बिजलीक िसनेहमे बिसेखीक परिवारक कोनो तीक्ष्ण अवरोध नै देखाएब दलित समाजक चेतनापर आधात मानल जाए। समाजक कात लागल वर्ग सवर्ण आ सामन्तवादी लग अपन घरक गणिकाकेँ परसि सकैत अछि... सर्वथा असंभव। दलित समाजक नारीसँ सवर्ण समाजक पुरुष बेबाक गप्प तखने कऽ सकैत छथि जखन हुनक विचार आ चरित्र विश्वसनीय हुअए। भऽ सकैत अछि बिजली सन कोनो विशेष नारी एहेन मानसिकता रखैत छथि वा होथि मुदा परिवारक आन लोक ऐ तरहक िसनेहकेँ कथमपि नै स्वीकार करत। जौं एकर अंत दुनूक बिआह देखा कऽ कएल जइतए तँ ई उपन्यास अवश्य दूरगामी होइतए। अंर्तद्वन्द्वसँ भरल समाजसँ ललित कोनो अलग नै छथि तँए सभ सकारात्मकताक आश राखब उचित नै।
एतेक तँ निश्चित जे पृथ्वीपुत्र शिल्पमे बड़ नीक स्थान रखैत अछि। विम्ब कोनो विशेष नै मुदा समाजक अंतिम वर्ग धरि पहुँचल तँए व्यापक मानल जाए। जितपुर मौजाक टोल बबुरबन्नाक गाथा, मुदा टोलमे खएरक बोन बबूरसँ बेसी मुदा नाओं बबुरबन्ना। वास्तविकता अछि सामर्थ्यवान लोक कम रहितौ पूजनीय होइत छथि, उपन्यासकारक दृष्टिकोण सम्यक् आ समन्वयवादी ऐठाम तँ अवश्य लगैत अछि। भाषा ओ शैली गतिमान आ खाँटी ग्रामीण आंचलिक मैथिलीमे लिखल गेल जे ललितक योग्यताक प्रत्यक्ष प्रमाण थिक। आाचार्य रमानाथ झाक ऐ मतसँ हम सहमति नै रखैत छी जे हास्य रसक अभावमे पृथ्वीपुत्र झुझुआन लगैत अछि। जखन स्थिति कनबाक हुअए तँ हास्य समागम संमव नै ऐ उपन्यासमे हास्य रसक समागम करब िनरर्थक होइतए।
ऐ पोथीक सभसँ सकारात्मक पक्ष थिक समाजक यथार्थवादी बेवस्थाक मौलिक चित्रण। जाति-पातिमे टुटल समाजक सत्यकेँ स्पष्ट देखबैत उपन्यासकार एकठाम एहेन साहस कऽ देलनि जे संभवत: सबल समाजमे जनमल दोसर साहित्यकारसँ अवश्य असंभव होइतए। पृथ्वीपुत्र पलायनवादक विरोध करैत अछि। जमीन्दार कृषिकार्य स्वयं नै करताह, मुदा जमीनक सकल उत्पाद आ स्वामित्व हिनके भेटनि, ऐ कटु सत्यसँ ललित विलग छथि। हिनक लेखनीसँ क्रांतिक सुगंध पसरल जे जमीन ओकरे हएत जे एकरा जोतए। वास्तविकता सेहो छैक साम्यवादी बेवस्थामे कर्म पुरुषकेँ कर्मक फल अवश्य भेटबाक चाही। जे संतान माए-बापक प्रति अपन कर्त्तव्य पालन नै करए ओकरा मातृ-पितृ सिनेह मंगबाक कोनो अधिकार नै। अपन पसेनासँ माटि कोरि जे मजूर धरतीकेँ बाँझ होएबासँ बचाबथि हुनके ऐ माटिक स्वामित्व भेटबाक चाही।
जौं ऐ प्रकारक सोचकेँ सबलता प्रदान कएल जाए तँ कृषि प्रधान देशमे अपन मौलिक कर्मसँ लोक विमुख भऽ पड़ाइन नै करताह। प्राकृतिक संतुलनकेँ जीवन्त राखब सभक मौलिक कर्त्तव्य थिक। ऐ तरहक साम्यवादी दृष्टिकोण मैथिली साहित्यकेँ अवश्य नव दिशा देलक। िनष्कर्षत: पृथ्वीपुत्र किछु अर्न्तद्वन्द्वसँ भरल रहलाक बादो मैथिली साहित्यमे नव चेतना भरबाक लेल अनुगामी उपन्यास मानल जाए।
जीवन-मरण :: दुर्गानन्द मण्डल
जीवन-मरण उपन्यास, एकटा लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक अनुपम कृति अइ। हुनक लिखल अनेको उपन्यास, जे एक-सँ-बढ़ि-कऽ–एक अछि। जइमे उपन्यासकार द्वारा उठाओल गेल विभिन्न प्रकारक सामाजिक रूढ़िवादिताक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत कएल गेल अछि। मात्र प्रस्तुतिकरण धरि कथा नै अपितु ओकर सामाधान तकबामे सेहो उपन्यासकार सतत् सफल रहला अछि।
प्रस्तुत उपन्यासमे मनुखक जे अपन जिनगी छै, ओकर जे अपन समाज छै, समाजक प्रति व्यक्ति विशेषक उत्तरदायित्व होइत अछि से, आ नवका पीढ़ी जे पश्चिमी सभ्यताक असभ्यतासँ ग्रसित भऽ असभ्य बनि गेला अछि तइपर उपन्यासक आरंम्भमे एकटा कसगर चोट देलनि अछि।
देवनन्दन जे बेवसायसँ डाॅक्टर छथि, पत्नी शीला द्वारा जनलनि जे पिताक मृत्यु भऽ गेल तैयो घबरेला नै सोचलनि पिताक अपन समाज छन्हि जइ बीच ओ अपन जिनगी बितौलनि। तँए उचित हएत जे हुनका अपना समाजमे पहुँचा दियनि आ मृत्युक सभ कर्म सामाजेक अनुकूल बढ़ियासँ करी िनर्णए लेलनि।
मोबाइलसँ नम्बर निकालि, टिपि अपन जेठ बेटा दयानन्दकेँ जनौलनि-
“बच्चा, बाबू मरि गेलाह, तँए दुनू भाँइ गाम आऊ।”
मुदा वाह रे पश्चिमी सभ्यता! देखू हमरा लोकनिकेँ केना ग्रसित केने अछि, दयानन्द बाजि उठलाह-
“बाबू, ऐ लेल गाम किअए जाएब? आब तँ बिजलीबला शबदाहमे आसानीसँ काज सम्पन्न भऽ जाइत अछि”
दयानन्दक विचार सुनि देवनन्दन कहलकनि-
“बच्चा, सभ जीव-जन्तुकेँ अपन-अपन जिनगी होइत अछि। आ जे जेहने जिनगीमे जीबैत अछि ओकरा लेल वएह जिनगी आनन्ददायक होइत अछि। जेना, चीनी, मिरचाइ आ करैला तीनूक तीन तरहक स्वाद, मीठ, कड़ू आ तीत होइए। मुदा की मरिचाइक कीड़ा आबि करैलाक कीड़ा चीनीमे जीब सकत? कथमपि नै। जखन की ओ तँ अधलाहसँ नीकमे गेल।”
पिताक बात सुनि दयानन्दकेँ आश्चर्य भेलनि, मुदा देवनन्दनक अनुसारे ऐमे आश्चर्य कोन। किएक तँ गामक दोसर नाम समाज सेहो छिऐ। जे शहर-बाजारमे नै अछि। ऐठाम उपन्यासकार समाजकेँ मानव नै मानवक जे मूल सभ्यता छै ओकरा एकैसम सदीक नव पीढ़ी लेल एकटा मिशाल देखौलनि अछि। जे वर्त्तमानमे आजुक पीढ़ी समाजकेँ नै बूझि किदैन बुझै छथिन, ओ बिसरि गेलाह जे समाज की थिक, ओकर मान-मर्यादा कि होइ छै, सामाजिक बन्धन की छी, ओकर कानून-कायदा की छै। आजूक वर्त्तमान आधुनिक समाज जइमे सभ अपने पाछू बेहाल रहैए। ओ केकर सुख-दुख, जीवन-मरणकेँ सुनत। ओ तँ भरिपेट नीक अन्न-तीमन खाएब मात्र जनैए। मुदा तइसँ कि मन थोड़े अस्थिर भऽ सकैए। जाधरि आत्माक संतुष्टि नै हेतैक। बुझेबामे केत्तौ कोनो प्रकारक किन्तु-परन्तु नै राखि, मनुक्ख एकटा सामाजिक प्राणी होइत अछि, ओकर अपन एकटा समाज छै, जइमे सभ एक-दोसराक सुखसँ सुखी आ दुखसँ दुखी होइ छथि, देखेबामे सफल भेलाह। वर्त्तमानमे जन्म जरूर जाति-समाजमे होइ छै, मुदा लगले आँखि-पाँखि भेने हमरालोकनि अपन मूल समाजकेँ भूलि-बिसरि आन समाजमे मिलि हूलि-मािल उठेने रहै छी। केतेक दुखक बात भेल। कला आ संस्कृितसँ दूर तँ स्वभाविक रूपे तँ छिहे ओना हम सभ कतेको नोर मंचपर किएक ने बहा ली।
दोसर दिस उपन्यासकार मिथिलानिक एकटा गजब चित्र प्रस्तुत केलनि अछि। मैथिल नारि अपन पतिकेँ परमेश्वर मानै छथि। जिनकेपर हुनका भरि मांग सेनुर आ भरि हाथ चुड़ी रहैत छन्हि। अपना पतिक प्रति कतेक निष्ठा रखै छथि स्पष्ट अछि-
“अदौसँ सावित्री, अनुसुर्इया आदि ऐ विषयमे जगविदित छथि। देवनंदनक माए सुभद्रा जिनका चेहरापर सोग नै अपितु सिनेह उमरि रहल छन्हि। मोने-मन आनंदित जे, जहिना हाथ पकड़लनि तहिना पार-घाट लगा देलनि। भड़ल-पुड़ल फुलवाड़ी अछि कतौ हेराएल रहब।”
मिथिलानिक महान विचार आ तियागक स्तरकेँ कतेक सुक्ष्म रूपेँ उपन्यासकार रखलनि अछि। तियागक मूर्तिक रूपमे ऐ तरहेँ स्पष्ट अछि जे पतिकेँ मुइला बादो हर्ष छन्हि जे हमरा अछेत मरलाह से नीके भेलनि। अन्यथा मोनमे लागल रहैत जे हुनक शेष दिन केहेन...।
सभ पौस-प्राणी गुनधुनमे पड़ल गाम चलल जा रहल छथि। देवनंदन सोचथि, से नै तँ आइ समाजक काज पड़त। समाजक की महत छै। मनुक्ख कोन तरहेँ सामाजिक प्राणी होइए, समाजक बीच बाबूजी केना जीबथि, कतेक परिवारसँ दोस्ती छलनि आ कतेकसँ दुश्मनी, गुनधुनमे पड़ल माएसँ पुछलखिन-
“माए, कते परिवारसँ बाबूजी केँ दोस्ती छेलनि।” तखन माएकेँ मोन पड़लनि ओ समाज, जतए सभ मिलि कुमरम, बिआह, सामा, घरक गोसाँइसँ लऽ कऽ दुर्गा स्थानक गीत मोन पड़ए लगलनि। देवनंदनक बात सुनि माए-सुभद्रा बजलीह-
“छिया, छिया। मिथिलाक समाज छी। ऐ समाजमे मुर्दा जरबैले, केकरो घरक आँगि मिझबैले, केकरो-साँप-ताप कटने रहल आकि गाछ-ताछपर सँ खसलापर केकरो कियो कहै नै छै। ई सामाजिक काज छी। तँए, अपन काज बूझि सभ अपने तैयार भऽ जाइत अछि।”
ऐठाम उपन्यासकार मिथिला आ मैथिल समाजक एकटा विलक्षण उदाहरण द’ अपन सभ्यता आ संस्कृतिक परिचए द’ समाजक समुद्री रूपकेँ दर्शन करौलनि अछि। पूर्वोमे बाढ़ि एलापर करियाकाका आ देवनंदन द्वारा उठाओल गेल कदम आबैबला समाजक लेल एकटा आदर्श उपस्थित केलनि अछि। आखिर दिन बिसेक बाद सभ घूमि अपन-अपन घर आएल रहथि। ओही समाजक एकटा अभिन्न अंग देवनंदनक पिता जे समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति रघुनंदनक लहाश गाम पहुँचते आगू-आगू गाड़ी आ पाछू करमान लागल लोक दियादीमे सबहक चुल्हि मिझाएल।
दोसर दिस उपन्यासकार जे मर्द-पुरुखक क्रिया-कलाप, स्त्रीगण सबहक गप-सप तँ एक दिस 111 बर्खक रधिया दादी गाइक गर्दनि जकाँ लटकल चमरी, बाइस गाहीक बर्ख भेल, पूर्वमे रधुनंदनकेँ कतेको दिन दूध पिऔने रहथिन, उपस्थित क’ सामाजिक आ मातृत्व प्रेमक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत केलनि। जिनका दादी जूरशीतलमे अछिंजलसँ असिरवाद द’ फगुूआमे रँगो खेलाइत छलीह। से सप्तरंगी समाजक इंद्रधनुषी संबंधक एकटा विलक्षण उदाहरण अछि।
श्राद्ध-बिआह समाजेक काज होइते अछि। समाज तँ समाजे होइए तहूमे ओहेन समाज जइठाम रघुनंदनकेँ उत्तरे-दछिने सुता उज्जर दप-दप वत्रसँ छाँपि सिरहानामे धूप-गुगुल जरैत अछि। तइ बीच बचनू, चंचन, झोली, बौकू, बतहू देहपर तौनी आ डाँरमे धोती पहिरने कान्हपर कुरहरि नेने संग-मिलि कानी-गाबी आ हँसी ऐ सँ पैघ सुख केकरा कहबै? जइ सुखक लेल लोक नीच-सँ-नीच काज करैए मुदा पाबि नै पबैए। ऐठाम उपन्यासकार भौतिक सुखकेँ सुख नै मानि आत्मिक सुख, अतिइन्द्रिय सुख जइसँ आत्मिक शान्ति भेटैत छै, ओ वास्तविक सुख थिक। तँए मात्र दैहिक सुखकेँ क्षणिक आ आत्मिक सुखकेँ वास्तविक बता अपनाकेँ आध्यात्मिक हेबाक सेहो परिचय द’ समाजोकेँ आध्यात्मिक बातपर चिन्तन-मनन अनुकरणक प्रेरणा देलनि अछि।
समाजक समस्त काजक जिम्मा करियाकाकापर छन्हि। समाजक ऊँच-नीच, छोट-पैघ सभ जातिक लोक, जाति-परजाति सभ मिलि रघुकाकाक काजमे पूर्ण सहयोग देबए चाहै छथि चाहे ओ िकर्तनिया हुअए आकि भजनिया, लेलहा हुअए आकि बौका, सुन्दर काका होथि वा छीतन भाय दुनू परानी जे जातिक डोम छथि। जे पूर्वमे गुनापर रघुकाकाकेँ पाँचटा गीत सुनौने छलाह। जीविते छथि छीतन भाय। छितनो भायकेँ बरियातीमे हकार देब नै बिसरब, समाजक जाति-पातिक कुप्रर्थासँ निकालि मनुक्खक जे एकटा अपन समाज होइछ, मनुक्खक जे एकटा जाति होइए जइमे सभ वर्ग आ वर्णक लोक रहैए, वास्तवमे ओ ने समाज छी। ओइ जातिगत भावनासँ ग्रसित समाजकेँ ऊपर मुँहेँ उठा स्वच्छ वातावरणमे शुद्ध साँस लेबाक बाट देखौलनि हेन। जहिना हवा अनेक गैसक मिश्रन छी तहिना तँ समाजो अनेक वर्ग आ वर्णक मिश्रण छी। जौं से नै तँ कियो एक-दोसरक बिना जीब सकत? संभव नै, मुदा से बुझैत लोक अपने स्वार्थमे आन्हर भेल रहैए। आ फल्लंमा डोम तँ फल्लांमा दुसाध ई संस्कार नैन्हियेटा सँ माए-बाप देबामे पाछू नै रहै छथि। आखिर एकटा प्रश्न हमरा तरफसँ, अहाँ प्रबुध समाजक लेल अछि, जौं समाजमे सभ जाति नै रहत तँ की समाजिक जीवन चलि सकत यदि हँ तँ केना? जौं नै तँ फेर एहेन भावना किएक? डोमसँ हम छूबल जाएब, मुदा ओकर बनाओल चीज-बौस गौसाँइ-पितरपर चढ़त तँ की इष्ट-देव नै छुऔत। जौं छुआएत तँ सनातनिये सँ किएक ने..... ? आ जौं देव-पितर नै छुआएत तँ हमरा-अहाँकेँ छुएबाक कोन आधार बनल अछि??
झाँपले परदामे उपन्यासकार जाति-प्रथाकेँ तोड़ि एकटा आदर्शवादी समाज स्थापनापर जोर देलनि। जहिना फुलवाड़ीमे जुही, चमेली फूल रहैत अछि तहिना गेना गुलाब सेहो। अधला नै तँ नीकक महत्ते की? तीत नै तँ मीठक स्वादे की? कारी नै तँ गोरे की? तहिना तँ समाजो एकटा फुलवाड़ी होइ छै। जइमे सभ तरहक लोकक अपन-अपन भूमिका होइ छैक।
विचार करबाक थिक जे वैदिक पद्धतिपर चलए बला समाजक चित्र जे जहजहि उपन्यासमे आएल अछि से तँ सहज अछि। मुदा आजुक ओहन समाज जइमे अलगाव अछि। मनुक्ख-मनुक्खमे एतेक अन्तर किएक अछि? प्रश्नक संग इशारामे उत्तर सेहो बतेबामे उपन्यासकार पाछू नै हटलथि। जेकर स्पष्ट उदाहरण रघुकाकाक बरियातीमे छीतन भाय सदृश लोककेँ अपन बाजाक संग भजन करैले चलैक लेल कहि एकटा आदर्श समाजक परिपक्व छाप छोड़लनि अछि।
ओतबे नै, एकटा कहावत अछि ‘भेल-गेलपर शिव जगरनाथ’ एहने एकटा व्यक्ति छथि फोंचभाय, पाही जमीनदारक टहलू धड़फराएल आबि छौंकए चाहै छथि ई बाजि-
‘सभ कथुक आरिऔन तँ देखै छी मुदा ससर आ घी कहाँ अछि?’
माने काज भँगठा एवं भरिया देबए चाहलनि। मुदा लेलहा फोंचभायकेँ चौहटैत ई सावित क’ देलकनि जे रघुकाका आ देवभाय सँ हमरो केकरोसँ कम अपेक्षा नै। फोंचभाय कएल काजमे केवल गलतियेटा तकैबला लोक छथि।
मुदा हाय रे उपन्यासकार, समस्त उपन्यासमे जीवन थिक तँ मरण असंभावी.., ई खेल चलिते रहैए। अही समाजक बीच लोक जनमो लइए आ मरबो करैए। पैघत्व तँ ऐ बातमे अछि जे जइ समाजमे रघुबाबू सन दाता छलाह आइ ओकरे ऋृण चुकबए खातिर अर्थी उठबैले बुझू जे मािर भ’ रहल अछि। तही बीच लेलहाक मुँहसँ अनायास निकलल जे सुनै जाउ, कान्ही लगा उठबियनु नै तँ दरद हेतनि।’ सभ मानि गेल।
एक दिस आंगनसँ लहास उठल आ दोसर दिस सहनाइपर विदाइक धून। आहहा... यएह तँ सुख आ दुखक दुिनयाँ छी। जीवन-मरणक सार्थकता छी। मुदा हमरालोकनि जीवनक एक्के भाग देखै आ जनै छी। जीवन आ मरण सृष्टिक चक्र छी। ऐसँ कियो बाँचल कहाँ। एक िदस करियाकाका आ दोसर दिस सुन्नरकाका रघुभायकेँ अंतिम प्रणाम कऽ डेग आगू बढ़ौलनि। पाछू-पाछू देवनंदनक हाथमे आगि अा कोहा दऽ पाछू-पाछू बरिआती सजि विदा भेल। तइ पाछू करियाकाका रेलगाड़ीक गार्ड जकाँ पाछू-पाछू। गाछी पहुँचि सभ कियो सभ कथुक जोगर अपना-अपना विवेकसँ लगा सिरहौना-पथौना रूपी औछाओनपर सुता एक-एक चेरा चढ़बैत छाती भरि ऊँच कऽ सुन्दरकाका देवक बाँहि पकड़ि धधकैत उक मुँहमे लगा देलकनि। बाँकी सभ काज समाजक निअमानुसार तेरहसँ सत्तर दिन धरि चलैत रहल। समाज तँ समाजक निअम। तही बीच हुलन दुनू परानी, जेकर आधा देह झाँपल आ आधा उघार छल, ओसरक नीच्चेसँ अपन कर्मकेँ धर्म बूझि प्रणाम केलकनि आ मने-मन सोचबो करए जे रघुबाबूक काजमे कत्ते वर्तन लागत।
ईम्हर देवबाबू जिनका गाड़ामे उतरी छन्हि हुनकोसँ बेसी चिन्ता करियाकाकाकेँ छन्हि मुदा करियाकाकासँ कम कुसुमलाल पण्डितकेँ कहाँ छै? ओकरा तँ ऐ बातक चिन्ता छै जे श्रधुआ वर्तनक काज तँ दसम-एगारहम दिन हएत, मुदा दहीक लेल?
ओतबे नै, रघुनन्दन बाबूक काजक मादे ततबेक चिन्ता राजेसर नौआकेँ सेहो। जेकर काज एक दिस पुजबैक प्रकिया तँ दोसर दििस कर्म सम्पन्न करेबाक। मुदा एतेक सभ किछु होइतौ अपना समाजमे जे पण्डितक किरदानी छन्हि तेकरो बखिया उघारैमे कतौ कमी नै रखला अछि। जे नायकक रूपमे शिवशंकर छथि जे अदौसँ अद्यतन आन-आन श्राध-कर्मक उदाहरण दऽ जजमानक खून उड़िस जकाँ पीबैत रहलाह जेकर साक्षात् उदाहरण सिट्ठी भेल समाज सबहक सोझामे अछि।
मनुक्ख विचारसँ पैघ होइत अछि। विचार बदलल। नव पीढ़ीक प्रसादे सुन्दर आ दुधिगर गाए सभ सेहो गाममे आएल। तइ बीच चाहक संग सभ सभ अपन-अपन विचार रखलनि। जइमे सर्वसम्मतिसँ विचार यएह भेल जे पाँच गोटे विचार कऽ डेग उठाउ,
(1) श्राद्ध घरवारी आ कर्ताक अनुकूल हुअए। दानस्वरूप मात्र झरखंडी बाछा नै दागल जाए।
(1)(2) आन गामक पंच माने भोज खेनिहारसँ परहेज कऽ गामक सभ जातिकेँ खुऔल जाए आन गामक दोस्त–कुटुम-दिआद तँ रहबे करता।
(1)ऐ प्रकारे उपन्यासक मादे उपन्यासकार हमरालोकनिक बीच व्याप्त विभिन्न प्रकारक नीक आ अधला प्रथा-रीति-चलनि-मान्यताक बीच विभिन्न प्रकारक लोक सबहक अमुल्य विचार आ ओही समाजक दालि-भातमे मुसलचन्दक उदाहरण दऽ ओकरासँ सावधान केलनि। सृष्टिक जे चक्र छी जीवन-मरण जइसँ कियो बँचि नै सकै छी जेकरा समाज आ कर्त्तकेँ मनोनुकूल कऽ समाजमे रचनात्मक काज करी ऐ लेल एकटा दिशा-िनर्देश देलनि। जेकरा देवनन्दन जी अपने शब्दे स्वीकार कऽ पिताक निम्मिते साले-साल भोजे नै वल्कि यथासाध्य कल्याणकारी काजक प्रेरणा देलनि।
नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि- दुर्गानन्द मण्डल
मैथिली साहित्यक एकटा विधा नाटक अछि, जे विधा सभ दिन रौदियाहे सन रहल। गिनल-चुनल नाटककारक किछु नाटक जे आंगुरपर गनल जा सकैत अछि, दोगा-दोगी कोनो पुस्तकालयक शोभा मात्र बढ़ौलक। एकटा समए छल जइमे नाटककार जे नाटक लिखलनि तइमे वाक्-पटुता नै रहबाक कारणे वा शुद्ध-अशुद्ध उच्चारण नै भेने वा समुचित वाद-संवादक संग समदियाक अभाव सभ दिन देखल गेल। चूँकि ओना हम जत्ते-जे ढकि ली मुदा एकटा सत्यकेँ स्वीकार करए पड़त जे हम मैथिल छी। हमरा लोकनिक मातृभाषा मैथिली भेल। मुदा माएकेँ माँ कहैत कनेको लाज विचार नै होइए। जेना कि आँखिसँ लाजक पानि खसि पड़ल। तात्पर्य, मैथिल होइतो दोसर भाषाक दासताक शिकार भेल छी आ ओकर भोग भोगि रहल छी, बुझाइत अछि जेना मैथिलीक लेल एेठामक माइटिये उसाह भऽ गेल अछि, जइपर गदपुरनि मात्र उपजि सकैए। मुदा ओहेन उसाह माटिपर “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी” लिखि नाटकार बेचन ठाकुर, चनौरागंज, मधुबनी, मैथिली नाट्य जगतमे एकर सफल मंचन कऽ महावीरी झंडा गाड़ि समस्त मैथिली, मैथिल आ मिथिलाक मान-सानकेँ मात्र बढ़ेबे टा नै कलनि अपितु चारि-चाँद लगा देलनि। ऐ लेल ठाकुर जीकेँ समस्त मैथिल भाषी आ नाट्य प्रेमीक तरफसँ हम कोटिश: धन्यैवाद दैत अपार हर्ष महसूस कऽ रहल छी। हमरा विश्वास अछि जे अपने ई दुनू रचना जेकर मंचन अपने अपनहि कोचिंग संस्थानक छात्र-छात्रा लोकनिसँ करा, ई साबित कऽ देलौं जे मिथिलाक माटिमे अखनो ओतेक शक्ति बचल अछि जइपर केसरो उपजि सकैत अछि।
नाटककारक नाटकक विषय अति उत्तम छन्हि। वर्त्तमान शताब्दीक सभ मनुख ऐ बातसँ भिज्ञ अछि, सरकारी सर्वेक्षणसँ सेहो स्पष्टत अछि जे दिनानुदिन लिंगानुपात बढ़ि रहल अछि। सभ राज्यक अनुपात थोड़े ऊपर-नीचाँ भऽ सकैए मुदा कियो ऐ बातसँ मुँह नै मोड़ि सकै छथि जे प्रति हजार लड़िका-लड़िकीक बीच एकटा बड़का खाधि बढ़ैत जा रहल अछि, जइ खाधिमे लड़िकीक अनुपात निरंतर नीचाँ मुँहेँ गिड़ैत जा रहल अछि आ हमरा लोकनि कानमे तूर-तेल दऽ निचेनसँ सूतल छी। जौं ई क्रम जारी रहल तँ आगू की हएत से तँ सोचू!! ई एकटा प्रश्नवाचक चिन्ह छोड़बामे नाटककार एकदम सफल रहला अछि। एतबे नै, आजुक वैज्ञानिक युगमे यंत्रादिक सहायतासँ ई जानि जे माइक गर्भमे पलैत बच्चाक, बेटा नै बेटी छी.... िनर्मम हत्या करबामे कनिक्को कलेजा नै कँपैए!! जेकर कोनो कसूर नै ओकरा कुट्टी-कुट्टी काटि खुने-खुनामे कऽ माइक गर्भसँ बहार कऽ दै छिऐ। जइ बेथे ओइ बच्चाक माए पनरह दिन धरि बिछौन धेने रहैत अछि। ऐठाम एकटा गप हम फरिछा कऽ कहि दिअ चाहै छी, ओ बेथा हुनकर ओइ बेटीक प्रतिये नै जेकर ओ हत्या करौलनि अछि, अपितु शारीरिक बेथा छन्हि जइ लेल एत्ते आ एहेन कुकर्म करै छथि। ओइ िनर्दोष बच्चाक माए-बाप दुनू ततबाए दोषी छथि। ओ ई नै बूझि रहल छथि जे जइ बेटीक ओ हत्याए करौलनि जौं ओ बेटी आइ नै रहैत तँ की अपने रहितौं? जौं बेटी नै हएत तँ सृष्टिक रचना संभव अछि? जौं हँ तँ केना वा नै तँ एहेन अपराध कऽ स्वयं किएक एतेक पैघ हत्यारा साबित भऽ रहल छी। रानी झांसी, लक्ष्मीबाई, सावित्री, अहिल्या, सती अनुसुइया, इन्दिरा गांधी, मैडम क्यूरी, मदर टेरेसा..., ईहो सभ तँ बेटीये छलीह। जौं हिनको हत्या पूर्वहिमे कऽ देल गेल रहैत तँ आइ.....। तखन आँखि रहैत एना हम सभ आन्हर किएक? बुइध रहैत मुर्खाहा जकाँ काज किए करै छी?
मनुक्ख तँ मनुक्ख छी ने, छागर-पाठी आकि गाए-महिंस तँ नै जे कतौ कोनो.....। तहूमे साढ़े-पारा अधिक भऽ जाए, गाए-महिंस कम, तखन की हएत? जौं हम-अहाँ ई नै सोचबै तँ के सोचताह? ऐ हत्याक पाछाँ एकटा अओर कारण अछि जेकर नाओं थिक दहेज। मुदा उहो तँ हमहीं अहाँ लेबाल आ देबालो छिऐ। अखनो समाजमे आ प्राय: गाम पाछाँ एक-आध गोटे जरूर छथि जे अपन बालकक बिआह एकटा नीक कुल-कनियाँ ताकि आदर्श बिअाह कऽ उदाहरण बनै छथि। ऐ काजक दोषीकेँ सजा नै दऽ िनर्दोषकेँ जानेसँ मारि दुनू परानी ऐ पापक भागीदारी छी। छीह.......।
शास्त्रो एकटा बात बतबैत अछि जे “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।” मुदा ओकर पूजा की करबै, ओइ देवीक संसारमे एबाक अधिकारे छीनि होइए, जे बड़का काज केलौं।
जतए समस्त विश्व ऐ समस्यासँ जरि रहल अछि ओतए नाटककार अपना नाटकक माध्यमे एकटा साधारणो लेखक सदृश अपन लेखनीक माध्यमे समाजमे ई संदेश देबामे पूर्णत: सफल छथि जे समए रहैत जौं नै चेतब तँ नाटकक मुख्य पात्र दीपक सदृश हाल हएत। जे अंतमे कनियाँक मुइला पछाति अपनेसँ भात पसाबथि, किएक तँ हुनक कनियाँ बरोबरि गर्भपात करेबाक कारणे शोनितक कमीसँ उड़ीस भऽ मुइलीह। एतबे नै, बेटीक अभावमे नगद गीनि आ तखन पुतोहु घर अनलाह। तखन हुनका कबीर साहैबक ई पाँति मोन पड़ैत छन्हि, “सन्तोक सभ दिन होत एक समाना।” आबो जौं नै चेतब तँ अहिना टाका दऽ बेटी बेसाहऽ पड़त। निरंतर चीज-बौस जकाँ बेटियोक दाम बढ़ैत जाएत, जेकरा किनैत-किनैत अहाँक प्राण निकलि जाएत। किएक तँ अपना समाजमे एकटा नै कएक टा मरूकियाबला अखनो जीविेते अछि, जे चारि लाख एकावन हजार टाका नगद आ सभ सरंजाम संगहि बरिआती ऊपरसँ। चेतु हे मैथिल आबो चेतु। नै तँ आब ओ दिन दूर नै जे गाड़ीपर नाव रहत। आब बेटी अपन अपमान बरदास नै कऽ सकैए।
ऐ प्रकारे नाटककार समाजक लेल एकटा पैघ संदेश दऽ रहल छथि जे गर्भपातसँ पैघ कोनो पाप नै होइत अछि। तँए ऐ पापसँ बची आ बेटीक बाप बनी। अहुना बेटा आ बेटी दुनू कोइखिक श्रृंगार होइए। ऐ तरहेँ श्री बेचन ठाकुर जी हमरा लोकनिक नीन तोड़ैमे सफल रहला। जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक प्रेरणापूर्ण आदर्शवादी व्यक्तिक हाथ हुनका माथपर छन्हि, हम सेहो बिनु मंगने शुभकामना दैत छियनि, रहबनि, जे अहिना नाटक लिखैत रहथु, मंचन करबैत रहथु। धन्यवादक पात्र श्रुति प्रकाशनक श्रीमती नीतू कुमारी आ नागेन्द्र झाजी केँ जे प्रकाशनक समस्त भार उठा कृतज्ञ हेबाक मौका देलखिन। जौं विदेह प्रथम पाक्षिक ई-पत्रिकाक सह सम्पादक उमेश मण्डल एवं सम्पादक गजेन्द्र बाबूकेँ, जिनक अथक सहयोगक प्रसादे प्रकाशनक रास्ता सुगम आ प्रकाशन सफल भेल, तँए नै लिखब-कहब तँ अनुचित।
Tuesday, August 28, 2012
जीवन-मरण :: दुर्गानन्द मण्डल
जीवन-मरण :: दुर्गानन्द मण्डल
जीवन-मरण उपन्यास, एकटा लब्ध
प्रतिष्ठित उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक अनुपम कृति अइ। हुनक लिखल
अनेको उपन्यास, जे एक-सँ-बढ़ि-कऽ–एक अछि। जइमे उपन्यासकार द्वारा उठाओल गेल विभिन्न
प्रकारक सामाजिक रूढ़िवादिताक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत कएल गेल अछि। मात्र प्रस्तुतिकरण
धरि कथा नै अपितु ओकर सामाधान तकबामे सेहो उपन्यासकार सतत् सफल रहला अछि।
प्रस्तुत उपन्यासमे मनुखक
जे अपन जिनगी छै, ओकर जे अपन समाज छै, समाजक प्रति व्यक्ति विशेषक उत्तरदायित्व
होइत अछि से, आ नवका पीढ़ी जे पश्चिमी सभ्यताक असभ्यतासँ ग्रसित भऽ असभ्य
बनि गेला अछि तइपर उपन्यासक आरंम्भमे एकटा कसगर चोट देलनि अछि।
देवनन्दन जे बेवसायसँ डाॅक्टर
छथि, पत्नी शीला द्वारा जनलनि जे पिताक मृत्यु भऽ गेल तैयो घबरेला नै सोचलनि
पिताक अपन समाज छन्हि जइ बीच ओ अपन जिनगी बितौलनि। तँए उचित हएत जे हुनका
अपना समाजमे पहुँचा दियनि आ मृत्युक सभ कर्म सामाजेक अनुकूल बढ़ियासँ करी िनर्णए
लेलनि।
मोबाइलसँ नम्बर निकालि, टिपि
अपन जेठ बेटा दयानन्दकेँ जनौलनि-
“बच्चा, बाबू मरि
गेलाह, तँए दुनू भाँइ गाम आऊ।”
मुदा वाह रे पश्चिमी सभ्यता! देखू हमरा लोकनिकेँ
केना ग्रसित केने अछि, दयानन्द बाजि उठलाह-
“बाबू, ऐ लेल गाम किअए
जाएब? आब तँ बिजलीबला शबदाहमे आसानीसँ काज सम्पन्न भऽ जाइत
अछि”
दयानन्दक विचार सुनि
देवनन्दन कहलकनि-
“बच्चा, सभ जीव-जन्तुकेँ
अपन-अपन जिनगी होइत अछि। आ जे जेहने जिनगीमे जीबैत अछि ओकरा लेल वएह जिनगी
आनन्ददायक होइत अछि। जेना, चीनी, मिरचाइ आ करैला तीनूक तीन तरहक स्वाद, मीठ,
कड़ू आ तीत होइए। मुदा की मरिचाइक कीड़ा आबि करैलाक कीड़ा चीनीमे जीब सकत? कथमपि नै। जखन की ओ तँ अधलाहसँ नीकमे गेल।”
पिताक बात सुनि दयानन्दकेँ
आश्चर्य भेलनि, मुदा देवनन्दनक अनुसारे ऐमे आश्चर्य कोन। किएक तँ गामक दोसर नाम
समाज सेहो छिऐ। जे शहर-बाजारमे नै अछि। ऐठाम उपन्यासकार समाजकेँ मानव नै मानवक
जे मूल सभ्यता छै ओकरा एकैसम सदीक नव पीढ़ी लेल एकटा मिशाल देखौलनि अछि। जे
वर्त्तमानमे आजुक पीढ़ी समाजकेँ नै बूझि किदैन बुझै छथिन, ओ बिसरि गेलाह जे
समाज की थिक, ओकर मान-मर्यादा कि होइ छै, सामाजिक बन्धन की छी, ओकर
कानून-कायदा की छै। आजूक वर्त्तमान आधुनिक समाज जइमे सभ अपने पाछू बेहाल रहैए। ओ
केकर सुख-दुख, जीवन-मरणकेँ सुनत। ओ तँ भरिपेट नीक अन्न-तीमन खाएब मात्र जनैए।
मुदा तइसँ कि मन थोड़े अस्थिर भऽ सकैए। जाधरि आत्माक संतुष्टि नै हेतैक।
बुझेबामे केत्तौ कोनो प्रकारक किन्तु-परन्तु नै राखि, मनुक्ख एकटा सामाजिक
प्राणी होइत अछि, ओकर अपन एकटा समाज छै, जइमे सभ एक-दोसराक सुखसँ सुखी आ दुखसँ
दुखी होइ छथि, देखेबामे सफल भेलाह। वर्त्तमानमे जन्म जरूर जाति-समाजमे होइ छै,
मुदा लगले आँखि-पाँखि भेने हमरालोकनि अपन मूल समाजकेँ भूलि-बिसरि आन समाजमे
मिलि हूलि-मािल उठेने रहै छी। केतेक दुखक बात भेल। कला आ संस्कृितसँ दूर तँ
स्वभाविक रूपे तँ छिहे ओना हम सभ कतेको नोर मंचपर किएक ने बहा ली।
दोसर दिस उपन्यासकार मिथिलानिक
एकटा गजब चित्र प्रस्तुत केलनि अछि। मैथिल नारि अपन पतिकेँ परमेश्वर मानै
छथि। जिनकेपर हुनका भरि मांग सेनुर आ भरि हाथ चुड़ी रहैत छन्हि। अपना पतिक
प्रति कतेक निष्ठा रखै छथि स्पष्ट अछि-
“अदौसँ सावित्री,
अनुसुर्इया आदि ऐ विषयमे जगविदित छथि। देवनंदनक माए सुभद्रा जिनका चेहरापर
सोग नै अपितु सिनेह उमरि रहल छन्हि। मोने-मन आनंदित जे, जहिना हाथ पकड़लनि
तहिना पार-घाट लगा देलनि। भड़ल-पुड़ल फुलवाड़ी अछि कतौ हेराएल रहब।”
मिथिलानिक महान विचार आ
तियागक स्तरकेँ कतेक सुक्ष्म रूपेँ उपन्यासकार रखलनि अछि। तियागक मूर्तिक
रूपमे ऐ तरहेँ स्पष्ट अछि जे पतिकेँ मुइला बादो हर्ष छन्हि जे हमरा अछेत
मरलाह से नीके भेलनि। अन्यथा मोनमे लागल रहैत जे हुनक शेष दिन केहेन...।
सभ पौस-प्राणी गुनधुनमे पड़ल
गाम चलल जा रहल छथि। देवनंदन सोचथि, से नै तँ आइ समाजक काज पड़त। समाजक की महत
छै। मनुक्ख कोन तरहेँ सामाजिक प्राणी होइए, समाजक बीच बाबूजी केना जीबथि, कतेक
परिवारसँ दोस्ती छलनि आ कतेकसँ दुश्मनी, गुनधुनमे पड़ल माएसँ पुछलखिन-
“माए, कते परिवारसँ
बाबूजी केँ दोस्ती छेलनि।” तखन माएकेँ मोन पड़लनि ओ समाज,
जतए सभ मिलि कुमरम, बिआह, सामा, घरक गोसाँइसँ लऽ कऽ दुर्गा स्थानक गीत मोन पड़ए
लगलनि। देवनंदनक बात सुनि माए-सुभद्रा बजलीह-
“छिया, छिया। मिथिलाक समाज छी। ऐ समाजमे मुर्दा जरबैले, केकरो
घरक आँगि मिझबैले, केकरो-साँप-ताप कटने रहल आकि गाछ-ताछपर
सँ खसलापर केकरो कियो कहै नै छै। ई सामाजिक काज छी। तँए, अपन
काज बूझि सभ अपने तैयार भऽ जाइत अछि।”
ऐठाम उपन्यासकार मिथिला आ
मैथिल समाजक एकटा विलक्षण उदाहरण द’ अपन सभ्यता आ संस्कृतिक परिचए द’ समाजक
समुद्री रूपकेँ दर्शन करौलनि अछि। पूर्वोमे बाढ़ि एलापर करियाकाका आ देवनंदन
द्वारा उठाओल गेल कदम आबैबला समाजक लेल एकटा आदर्श उपस्थित केलनि अछि। आखिर
दिन बिसेक बाद सभ घूमि अपन-अपन घर आएल रहथि। ओही समाजक एकटा अभिन्न अंग
देवनंदनक पिता जे समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति रघुनंदनक लहाश गाम पहुँचते
आगू-आगू गाड़ी आ पाछू करमान लागल लोक दियादीमे सबहक चुल्हि मिझाएल।
दोसर दिस उपन्यासकार जे
मर्द-पुरुखक क्रिया-कलाप, स्त्रीगण सबहक गप-सप तँ एक दिस 111 बर्खक रधिया दादी
गाइक गर्दनि जकाँ लटकल चमरी, बाइस गाहीक बर्ख भेल, पूर्वमे रधुनंदनकेँ कतेको दिन
दूध पिऔने रहथिन, उपस्थित क’ सामाजिक आ मातृत्व प्रेमक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत
केलनि। जिनका दादी जूरशीतलमे अछिंजलसँ असिरवाद द’ फगुूआमे रँगो खेलाइत छलीह। से
सप्तरंगी समाजक इंद्रधनुषी संबंधक एकटा विलक्षण उदाहरण अछि।
श्राद्ध-बिआह समाजेक काज
होइते अछि। समाज तँ समाजे होइए तहूमे ओहेन समाज जइठाम रघुनंदनकेँ उत्तरे-दछिने
सुता उज्जर दप-दप वत्रसँ छाँपि सिरहानामे धूप-गुगुल जरैत अछि। तइ बीच बचनू,
चंचन, झोली, बौकू, बतहू देहपर तौनी आ डाँरमे धोती पहिरने कान्हपर कुरहरि नेने
संग-मिलि कानी-गाबी आ हँसी ऐ सँ पैघ सुख केकरा कहबै? जइ सुखक लेल लोक
नीच-सँ-नीच काज करैए मुदा पाबि नै पबैए। ऐठाम उपन्यासकार भौतिक सुखकेँ सुख नै
मानि आत्मिक सुख, अतिइन्द्रिय सुख जइसँ आत्मिक शान्ति भेटैत छै, ओ वास्तविक
सुख थिक। तँए मात्र दैहिक सुखकेँ क्षणिक आ आत्मिक सुखकेँ वास्तविक बता
अपनाकेँ आध्यात्मिक हेबाक सेहो परिचय द’ समाजोकेँ आध्यात्मिक बातपर चिन्तन-मनन
अनुकरणक प्रेरणा देलनि अछि।
समाजक समस्त काजक जिम्मा
करियाकाकापर छन्हि। समाजक ऊँच-नीच, छोट-पैघ सभ जातिक लोक, जाति-परजाति सभ मिलि
रघुकाकाक काजमे पूर्ण सहयोग देबए चाहै छथि चाहे ओ िकर्तनिया हुअए आकि भजनिया,
लेलहा हुअए आकि बौका, सुन्दर काका होथि वा छीतन भाय दुनू परानी जे जातिक डोम
छथि। जे पूर्वमे गुनापर रघुकाकाकेँ पाँचटा गीत सुनौने छलाह। जीविते छथि छीतन
भाय। छितनो भायकेँ बरियातीमे हकार देब नै बिसरब, समाजक जाति-पातिक
कुप्रर्थासँ निकालि मनुक्खक जे एकटा अपन समाज होइछ, मनुक्खक जे एकटा जाति
होइए जइमे सभ वर्ग आ वर्णक लोक रहैए, वास्तवमे ओ ने समाज छी। ओइ जातिगत भावनासँ
ग्रसित समाजकेँ ऊपर मुँहेँ उठा स्वच्छ वातावरणमे शुद्ध साँस लेबाक बाट देखौलनि
हेन। जहिना हवा अनेक गैसक मिश्रन छी तहिना तँ समाजो अनेक वर्ग आ वर्णक मिश्रण
छी। जौं से नै तँ कियो एक-दोसरक बिना जीब सकत? संभव नै, मुदा से बुझैत लोक अपने स्वार्थमे
आन्हर भेल रहैए। आ फल्लंमा डोम तँ फल्लांमा दुसाध ई संस्कार नैन्हियेटा सँ
माए-बाप देबामे पाछू नै रहै छथि। आखिर एकटा प्रश्न हमरा तरफसँ, अहाँ प्रबुध
समाजक लेल अछि, जौं समाजमे सभ जाति नै रहत तँ की समाजिक जीवन चलि सकत यदि हँ
तँ केना? जौं नै तँ फेर एहेन भावना किएक? डोमसँ हम छूबल जाएब, मुदा ओकर बनाओल चीज-बौस गौसाँइ-पितरपर चढ़त तँ की
इष्ट-देव नै छुऔत। जौं छुआएत तँ सनातनिये सँ किएक ने..... ? आ जौं देव-पितर नै छुआएत तँ हमरा-अहाँकेँ छुएबाक कोन आधार बनल अछि??
झाँपले परदामे उपन्यासकार
जाति-प्रथाकेँ तोड़ि एकटा आदर्शवादी समाज स्थापनापर जोर देलनि। जहिना फुलवाड़ीमे
जुही, चमेली फूल रहैत अछि तहिना गेना गुलाब सेहो। अधला नै तँ नीकक महत्ते की? तीत नै तँ मीठक स्वादे
की? कारी नै तँ गोरे की? तहिना तँ
समाजो एकटा फुलवाड़ी होइ छै। जइमे सभ तरहक लोकक अपन-अपन भूमिका होइ छैक।
विचार करबाक थिक जे वैदिक
पद्धतिपर चलए बला समाजक चित्र जे जहजहि उपन्यासमे आएल अछि से तँ सहज अछि।
मुदा आजुक ओहन समाज जइमे अलगाव अछि। मनुक्ख-मनुक्खमे एतेक अन्तर किएक अछि? प्रश्नक संग इशारामे
उत्तर सेहो बतेबामे उपन्यासकार पाछू नै हटलथि। जेकर स्पष्ट उदाहरण रघुकाकाक
बरियातीमे छीतन भाय सदृश लोककेँ अपन बाजाक संग भजन करैले चलैक लेल कहि एकटा
आदर्श समाजक परिपक्व छाप छोड़लनि अछि।
ओतबे नै, एकटा कहावत अछि ‘भेल-गेलपर
शिव जगरनाथ’ एहने एकटा व्यक्ति छथि फोंचभाय, पाही जमीनदारक टहलू धड़फराएल आबि
छौंकए चाहै छथि ई बाजि-
‘सभ कथुक आरिऔन तँ देखै छी
मुदा ससर आ घी कहाँ अछि?’
माने काज भँगठा एवं भरिया
देबए चाहलनि। मुदा लेलहा फोंचभायकेँ चौहटैत ई सावित क’ देलकनि जे रघुकाका आ
देवभाय सँ हमरो केकरोसँ कम अपेक्षा नै। फोंचभाय कएल काजमे केवल गलतियेटा तकैबला
लोक छथि।
मुदा हाय रे उपन्यासकार,
समस्त उपन्यासमे जीवन थिक तँ मरण असंभावी.., ई खेल चलिते रहैए। अही समाजक बीच
लोक जनमो लइए आ मरबो करैए। पैघत्व तँ ऐ बातमे अछि जे जइ समाजमे रघुबाबू सन दाता
छलाह आइ ओकरे ऋृण चुकबए खातिर अर्थी उठबैले बुझू जे मािर भ’ रहल अछि। तही बीच
लेलहाक मुँहसँ अनायास निकलल जे सुनै जाउ, कान्ही लगा उठबियनु नै तँ दरद हेतनि।’
सभ मानि गेल।
एक दिस आंगनसँ लहास उठल आ
दोसर दिस सहनाइपर विदाइक धून। आहहा... यएह तँ सुख आ दुखक दुिनयाँ छी। जीवन-मरणक
सार्थकता छी। मुदा हमरालोकनि जीवनक एक्के भाग देखै आ जनै छी। जीवन आ मरण सृष्टिक
चक्र छी। ऐसँ कियो बाँचल कहाँ। एक िदस करियाकाका आ दोसर दिस सुन्नरकाका
रघुभायकेँ अंतिम प्रणाम कऽ डेग आगू बढ़ौलनि। पाछू-पाछू देवनंदनक हाथमे आगि अा
कोहा दऽ पाछू-पाछू बरिआती सजि विदा भेल। तइ पाछू करियाकाका रेलगाड़ीक गार्ड
जकाँ पाछू-पाछू। गाछी पहुँचि सभ कियो सभ कथुक जोगर अपना-अपना विवेकसँ लगा सिरहौना-पथौना
रूपी औछाओनपर सुता एक-एक चेरा चढ़बैत छाती भरि ऊँच कऽ सुन्दरकाका देवक बाँहि
पकड़ि धधकैत उक मुँहमे लगा देलकनि। बाँकी सभ काज समाजक निअमानुसार तेरहसँ सत्तर
दिन धरि चलैत रहल। समाज तँ समाजक निअम। तही बीच हुलन दुनू परानी, जेकर आधा देह
झाँपल आ आधा उघार छल, ओसरक नीच्चेसँ अपन कर्मकेँ धर्म बूझि प्रणाम केलकनि आ
मने-मन सोचबो करए जे रघुबाबूक काजमे कत्ते वर्तन लागत।
ईम्हर देवबाबू जिनका
गाड़ामे उतरी छन्हि हुनकोसँ बेसी चिन्ता करियाकाकाकेँ छन्हि मुदा करियाकाकासँ
कम कुसुमलाल पण्डितकेँ कहाँ छै? ओकरा तँ ऐ बातक चिन्ता छै जे श्रधुआ वर्तनक काज तँ दसम-एगारहम
दिन हएत, मुदा दहीक लेल?
ओतबे नै, रघुनन्दन बाबूक
काजक मादे ततबेक चिन्ता राजेसर नौआकेँ सेहो। जेकर काज एक दिस पुजबैक प्रकिया
तँ दोसर दििस कर्म सम्पन्न करेबाक। मुदा एतेक सभ किछु होइतौ अपना समाजमे जे
पण्डितक किरदानी छन्हि तेकरो बखिया उघारैमे कतौ कमी नै रखला अछि। जे नायकक
रूपमे शिवशंकर छथि जे अदौसँ अद्यतन आन-आन श्राध-कर्मक उदाहरण दऽ जजमानक खून उड़िस
जकाँ पीबैत रहलाह जेकर साक्षात् उदाहरण सिट्ठी भेल समाज सबहक सोझामे अछि।
मनुक्ख विचारसँ पैघ होइत
अछि। विचार बदलल। नव पीढ़ीक प्रसादे सुन्दर आ दुधिगर गाए सभ सेहो गाममे आएल।
तइ बीच चाहक संग सभ सभ अपन-अपन विचार रखलनि। जइमे सर्वसम्मतिसँ विचार यएह भेल
जे पाँच गोटे विचार कऽ डेग उठाउ,
(1) श्राद्ध घरवारी आ कर्ताक
अनुकूल हुअए। दानस्वरूप मात्र झरखंडी बाछा नै दागल जाए।
(2) आन गामक पंच माने भोज खेनिहारसँ
परहेज कऽ गामक सभ जातिकेँ खुऔल जाए आन गामक दोस्त–कुटुम-दिआद तँ रहबे करता।
ऐ प्रकारे उपन्यासक मादे उपन्यासकार
हमरालोकनिक बीच व्याप्त विभिन्न प्रकारक नीक आ अधला प्रथा-रीति-चलनि-मान्यताक
बीच विभिन्न प्रकारक लोक सबहक अमुल्य विचार आ ओही समाजक दालि-भातमे मुसलचन्दक
उदाहरण दऽ ओकरासँ सावधान केलनि। सृष्टिक जे चक्र छी जीवन-मरण जइसँ कियो बँचि
नै सकै छी जेकरा समाज आ कर्त्तकेँ मनोनुकूल कऽ समाजमे रचनात्मक काज करी ऐ लेल
एकटा दिशा-िनर्देश देलनि। जेकरा देवनन्दन जी अपने शब्दे स्वीकार कऽ पिताक
निम्मिते साले-साल भोजे नै वल्कि यथासाध्य कल्याणकारी काजक प्रेरणा देलनि।
Sunday, August 26, 2012
जगदीश प्रसाद मंडलक “गामक जिनगी”- धनाकर ठाकुर
श्री जगदीश प्रसाद मंडलक “गामक जिनगी” कथा संग्रहमे १९ कथा छन्हिद। कथा सबहक शीर्षक बहुत छोट राखब लेखकक विशेषता छन्हि। मुदा ऐ कारणे ई मुख्यक पात्र प्रधान रहि जाइत अछि।
गामक जिनगी केना शहरसँ अलग अछि संभवत: लेखक एकरहि प्रदर्शित करक प्रयास विविध कथामे केने छथि। औद्यौगिक क्रांतिक बाद बनल शहर, गामहिसँ उपटल लोकसँ बसल अछि गामहिसँ जीविकाक खोजमे गेल लोकसँ जे बादमे क्रमश: गाम छोड़ि देलनि। गाम छोड़ि कोनो शहरमे जेबाक कारण प्रारम्भिाक अवस्थालमे औद्यौगिक पूंजी हुअए जइमे गामक वर्णवैषम्यिक भाव भऽ नै रहल हुअए मिथिलाक लेल कोसी-कमला समेत अनेक नदीमे अबएबला बाढ़ि कारण रहल अछि ओना बाढ़ि स्वियं सेहो बड़का औद्यौगिक देशक सामान बेचक प्रकरण-उपकरणमे बनएबला बड़का बैराज-बांध आदिक कारणहि अछि।
लेखककेँ मनमे कचोट छन्हिअ जे लोक किएक गाम छोड़ि बाहर जाइत अछि। पंजाब तक जकर परिणाम होइत छन्हिो बादमे नाव चलबैत, वा गामपर रिक्शाह चलबैत लगक कसबा वा स्टेनशनसँ जे पात्र कहैत छन्हिप- “हमर गामक लोक पंजाब नै जाइत अछि।”
किछु वर्ष पूर्व घोघरडीहा वा जयनगर सन स्टेशनसँ पंजाब आदिक छपल टिकट भेटैत छलैक जे एक दिनमे एक-एक स्टेँशनसँ लाख- लाख टाकाक कटि जाइत छलैक जइपर पंजाबमे हरित क्रांति अओलैक।
प्रतिनिधि कथा “डाक्टेर हेमन्तआ”, स्वियं डाक्टपर होइक चलते हम
सर्वप्रथम पढ़लौं। एक डाक्टइरक बेटा डाक्ट र हेमन्तर प्राय: दरभंगामे
काज करैत “लक्ष्मीकपुर” (बाढ़िक गाम निर्मली लग) जाइत अछि अधिकारीक आदेशसँ। चूँकि ओ स्वटयं एक गामसँ निकलल अछि पिताजीक उपार्जित धनक बंटबारामे मुकदमेबाजीसँ त्रस्त् अछि। डाक्टरर हेमन्तर तँ मिथिलेक शहरमे रहलाह। जतए कि प्रमंडल एखन तक सहरसा या शहर सन कहबैत अछि। जतए कोनो शहर शहर सन नै अछि बल्किो गामहिक एक प्रतिरूप अछि। मुदा हुनक बेटा कोनो दोसर प्रांतक शहरमे नौकरी लेल चलि गेलखिन। डाक्टकर नै बनलखिन यद्यपि कहानीमे ई लिखल नै अछि किएक मुदा संभवत: आब डाक्टरी पढ़नाइ कम टाका दऽ भऽ गेल अछि तँए। किछु वर्ष पहिने तकक बिहारक गुंडाराजमे फिरौती अपहरणक कथा सामान्यस छल जकर धमकी स्वेरूप लाख टाका वा मौतक धमकी हेमन्त्केँ सेहो भेटलनि मुदा ओहूसँ पैघ धमकी बाढ़ि क्षेत्रमे काज करए जाउ वा जेल जे सामान्यखत: सुनल नै गेल अछि मुदा शासनक आतंक चोर-गुंडासँ कम नै तकर उदाहरण अछि ऐमे। फिरौतीक माँगसँ बँचबाक लेल यदि बाढ़ि-ड्यूटीकेँ हेमन्ति अंतमे धन्य वाद दैत तँ कथाक पूर्णतामे एक डेग होइत आ तहिना बाढ़िमे कतौसँ आएल कोनो परिवारमे पालिता सुकन्याय सुलोचनाक प्रति
डाक्ट रक मनोभावक विकास कथामे नै भऽ पएल। सुन्दलरी सुलोचनाक आयु किछु बढ़ा नवयौवना बना आेइपर कामुक मनोदशाक चित्र खिंचल जा सकैत छल वा एक छोट कन्या क रूपमे बालिका सुलोचनाक प्रति वात्सेल्य ताक जे मैथिल
परम्प रा अनुसार होइत- “चलू दरभंगा ओतहि पढ़ब अहाँ।” किएक तँ विदेशी मनोदृष्टिाजन्यद कामव्याकधिसँ छोट बालिकामे कामुकता तकनाइ हमरा सबहक अग्राह्य रहैत। वा, सुलोचना किछु मास बाद दरभंगा कोनो बीमारी जेना सांपक विष (जकर चर्चा प्रारम्भ मे अछि, लऽ डाक्टीर हेमन्तगक क्लिवनिकपर आबि बचि जइतथि वा एन्टीध-स्ने्क भेनमक अभावमे तँ कहुना पहुँचियौ कऽ दम तोड़ि दितथि वा बँचलाक बाद आेइ समए डाक्टिर हेमन्तरक नौकरीया बेटा
गामपर आएल रहैत आ ओकरा बियाहि बंगलोर लऽ जइतथि। मतलब जे कथामे बात उठए से पूर्ण हेबाक चाही। गामक पड़ाइन रूकि जाए, दरिद्रा कम भऽ जाए आदि आ तहिना भाषागत शुद्धता हिन्दीजसँ लेल शब्दह लेल सेहो समान “सामान” जकाँ ग्रहण करब उचित लेखककेँ। किताबक छपाइ नीक मुदा फोन्ट“ पैघ हेबाक छल आ दाम किछु कम उपेक्षित छल जे प्रकाशकीय धर्मक अनुरूप होइत।
मैथिली चित्रकथा/ गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा - डा. रमण झा
श्रीमती प्रीति ठाकुरक दू गोट सचित्र कथा संग्रह -मैथिली चित्रकथा एवं गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा देखलौं आ पढ़लौं । चित्रक माध्यमे कथाक प्रस्तुति एकटा अभिनव प्रयोग थिक जे लोककेँ, विषेषतः बच्चा सभकेँ अपना दिस आकृष्ट करत।
खिस्सा पिहानी कहबाक आ सुनबाक परंपरा मिथिलामे अदौसँ चल आबि रहल अछि। बूढ़ पुरान स्त्रीगण लोकनि छोट-छोट बच्चा सबहक े ँ सुतयबाक काल नाना प्रकारक खिस्सा सभ सुनबैत छथि जे मनोरंजनक संग संग उपदेषप्रद एवं षिक्षाप्रद सेहो रहैत अछि। आेइ खिस्सा सभमे प्रसिद्ध अछि -दैत्य सभक खिस स्सा, राज कुमार सबहक खिस्सा, रामायण महाभारतक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा प्रभृति। उच्च विद्यालय एवं महाविद्यालयमे प्रवेष कयलाक बाद छात्र-छात्रा लोकनि स्वयं कथा पढ़ैत छथि, बुझैत छथि, ओकर रसास्वादन करैत छथि आ समैपर लोककेँ सेहो सुनबैत छथि।
मैथिलीक संग विडम्वना ई अछि जे महा विद्यालय एवं विष्वविद्यालय स्तरपर लोक विषयक रूपमे मैथिली रखितो अछि, पढ़ितो अछि किन्तु विद्यालय स्तरपर सरकारी घोसनाक बादो लोक ने मैथिली विषयक रूपमे रखैत अछि आने मैथिली माध्यमे कोनो आने विषय पढ़ैत अछि। एतेक धरि जे मिथिलांचलक विद्यालय सभमे गुरुओजी लोकनि मैथिलीमे पढ़यबामे हीनताक बोध करैत छथि। नव युवक लोकनि बियाह होइतहि पत्नीक संग हिन्दी झारय लगैत छथि। कनेक पढ़ल लिखल आ पदवीबला लोक सभकेँ देखबनि जे अपनामे जँ मैथिलीयोमे गप्प करताह तँ बच्चा सभसँ निष्चय रूपसँ हिन्दीमे। हुनका सभकेँ ई नै बुझाइत छन्हिे जे मैथिली भाषा कठिन छैक। एकर समुचित ज्ञान जँ बच्चामे नै होयतैक तँ बादमे होयब कठिन छैक । कवीष्वर चन्दा झा अमैथिलीभाषी(अन्यदेषीयक)क हेतु मैथिली भाषा ओहने कठिन कहलनि अछि जेहन एकटा इचना माछक बच्चाक हेतु समुद्रक सभटा जलकेँ पीयब छैक-
भाषा यदन्यदेषीयोः मिथिलायाः भवेत्तदा।
प्ीतमिंचाकपोतेन समस्तं वारिधेर्जलम्।।
जतय धरि हिन्दीक प्रष्न अछि तँ ओ तँ राष्ट्रªभाषा थिक । अनिवार्य विषय थिक। ओकर ज्ञान तँ स्वतः प्रत्येक व्यक्तिकेँ होयतैक आ रहिते छैक।
एहन स्थितिमे श्रीमती प्रीति ठाकुरक उपर्युक्त विवेच्य पोथी देखि हमर मन गदगद भए गेल। गोनू आ आन मैथिली चित्रकथामे कुल १६ गोट कथा अछि जइमे गोनू झासँ सम्बद्ध नओ गोट कथा, महाकवि कालिदाससँ सम्बद्ध एक गोट आ शेष छओटामे राजा सलहेस, नैका बनिजारा इत्यादि प्रमुख चर्चित कथा सभ काल्पनिक चित्रक माध्यमे चित्रित कएल गेल अछि। ऐ सभ कथामे किछु बात तँ शब्दक माध्यमे अभिव्यक्त कएल गेल अछि आ किछु गप्प चित्र स्वयं कहैत अछि। ऐ कथा सबहक प्रसंग जे लोकक मनमे एकटा भावचित्र छल होयतैक से एतय बूझि पड़ैत अछि जेना साकार भए उठल हो।
विदुषी कथा लेखिकाक दोसर संग्रह थिक मैथिली चित्रकथा जइमे कुल १० गोट प्रमुख कथा सभ वर्णित अछि। ऐ कथा सबहक बीच बीचमे काल्पनिक चित्र सबहक समायोजन कथाक यथार्थताकेँ प्रमाणित करैत अछि। ऐ संग्रहमे संग्रहित महत्वपूर्ण कथा सभ थिक -राजा सलहेस, बोधि कायस्थ, दीना भदरी, नैका बनिजारा, विद्यापतिक आयु अवसान प्रभृति।
हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे उपर्युक्त दुनू कथा संग्रह बच्चा सभकेँ तँ आकृष्ट करबे करत अपितु समाजक सभ वर्गक लोककेँ एक बेर एकरा उलटयबाक लिप्सा होयबे करतैक। ऐ दिशामे श्रीमती ठाकुरक स्तुत्य प्रयास अछि, साहसिक डेग अछि आ अभिनव प्रयोग अछि। हमर शुभकामना अछि जे कथा लेखिका एहने सरस, सहज आ सजल रचना सभसँ मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ सुरभित करैत रहथि।
डॉ. शेफालिका वर्मा - प्रीति ठाकुरक मैथिली चित्रकथा
प्रत्येक भाषामे किछु एहेन रचनाकार होएत छथि, महिला वाकि पुरुष-वर्ग, अपन विलक्षण प्रतिभाक कारण सभसँ फराक बुझा पडै़त छैथ। ई दोसर बात थिक की आलोचक वर्ग महिला लेखनकेँ इतिहासक पन्नाक एकटा कोन दऽ दैत छथि। किछु भाग्यशाली लेखिकाकेँ किछु स्थानो भेट जाइत छैक, मुदा, समग्रतामे नै। लेखनमे महिला पुरुष नै होइत छैक, जइ विषएपर लेखक लिखैत छैथ, आेइपर लेखिका सेहो लिखैत छथि, कखनो बेसी नीक, बस, आब एकेटा प्रतीक्षा अछि जे कोनो सशक्त महिला आलोचककेँ देखी, जे महिला नै भऽ मात्र आलोचक रहथि, पूर्वाग्रहसँ रहित नीक आलोचनाकेँ जन्म दैत। मैथिली साहित्यक इतिहासमे चारि चान लगाबथि, हम जनैत छी एहेन विद्वान लेखिकाक कमी नै अछि......
आइ प्रीति ठाकुरक मैथिली चित्रकथा, गोनुझापर पोथी देखि चमत्कृत भऽ गेलौं। पहिने तँ हम मैथिलीक नेना भुटका लेल कोमिक्स बुझ्लौं, मुदा पढ़ए लगलौं तँ एकरामे डूबी गेलौं गागरमे सागर...। अद्भुद.. मैथिली लोकगाथाक विपुल संसारकेँ शिवक जटाजूट जकाँ कोना समेटी लेने छथि, ई पढ़ला उप्रानते बुझा पडत। कतेक कथाक खाली नाओं सुनने छलौं, ओ सभ ऐ पोथीमे साकार छल। जहिना आजुक समाज अकबर बीरबलकेँ बिसरि रहल अछ, ओहिना गोनू झाकेँ।
प्रस्तुत पोथिक माध्यमसँ पाठक अपन समाजक सभ वर्गक आदर्शकेँ चीन्हि सकैत छथि।
प्रीति जीकेँ अशेष शुभकामना एतेक सुन्दर पोथी लेल, प्रीतिजी आ गजेन्द्रजी सँ हम एकटा आग्रह करबनि जे कोसी नदी लेल बड़ खिस्सा कथा समाजमे पसरल छैक, ओकरो चित्रकलामे समेटि लथि। कोसी नदीक रहस्यमय चरित्र, सिंघेश्वर बाबासँ बियाह आदि, आदि खिस्सा सभ.....जहिना समाजक प्रत्येक क्षेत्रमे नारी आइ निरंतर आगू बढ़ि रहल छथि, ओहिना मैथिली मिथिलाक विकासमे आजुक नारी अपन अपन स्तरसँ अमूल्य योगदान दऽ रहल छथि। अशेष साधुवाद, प्रीतिजी, असंख्य शुभाशंसा.........।
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