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Monday, March 31, 2014

सगर राति दीप जरयक इतिहास- कथाक कथा

सगर राति दीप जरयक इतिहास जे रमण द्वारा परसल जा रहल अछि, ओइमे एकर प्रारम्भ केना भेलसँ ल' क' अखन धरिक इतिहास मे बहुत रास विसंगति अछि । एकर प्रारम्भ केना भेलसँ ल' क' अखन धरिक इतिहासमे बहुत गोटेक योगदान बढ़ा क', बहुत गोटेक घंटा क', बहुत गोटेक परिवर्तित क' क' प्रस्तुत काल गेल तँ बहुत गोटे निपत्ता क' जेल गेला। कहल गेल जे ई स्वायत्त संस्था अछि मुदा चेतना समितिक दिससँ रमण आ अजित आजाद सम्मिलित होइत रहला आ जत' कियो माला नै उठेलक ओत' ई लोकनि चेतना समिति दिससँ माला उठेलन्हि आ संयोजकमे चेतना समितिक नाम नै आन नाम इतिहास बनबै लेल गेल गेल। चेतना समिति ( गौरीनाथक सूचनाक अनुसार) जखन गौरीनाथ, अग्निपुष्प आ प्रदीप बिहारी पर लिखित प्रतिबन्ध लगेलक तकरार बाद बिहारी द्वारा लिखित माफी ऐ मैरेज हॅाल ( चेतना समिति) सँ माँगल गेल, फेर हुनका रचना लेल नै, वरन ऐ कृत्य लेल अकादमी पुरस्कार देल गेल आ ओ सेहो ऐ मैरेज हॅालक प्रतिनिधि भ' गेला। फेर ई तिकड़ी श्याम देवघरे संग मिलि क' सगर रातिमे की सभ केलक से रमणक जातिवादी इतिहासमे नै भेटत।
की छल ओइ सगर रातिक रजिस्टरमे जकरा रमण कहि रहल छथि जे विभारानी हेरा देलन्हि। की ई रजिस्टर हेरा गेल बा हेरा जाइ देल गेल। मुदा किछु गप जे नै रमणकेँ बुझा छन्हि ने विभा । रानीकेँ से अछि जे आरती कुमारी अपन मृत्युसँ २-३ दिन पहिने ओकर फोटो स्टेट उमेश मण्डलकेँ पठा देलखिन्ह। ओ चाहितथि तँ कोने झारे झाकेँ सेहो पठा सकैत रहथि, मुदा हुनका झारेझा सभपर विश्वास नै छलन्हि, किए नै छलन्हि? कहल गेल छे जे शोनित अपन निशान छोड़ते अछि। शीघ्र सगर रातिक असली इतिहास।
दरभंगा बला गोष्ठी , जे ३१ म इ २०१४ केँ दरिहरे- रमण- बिहारी द्वारा साहित्य अकादेमी आ ऒकरा द्वारा मान्यता प्राप्त फर्जी मैथिली संस्था सभक संग रमण-दरिहरे-बिहारी सन - सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी तथाकथित साहित्यकार सभ द्वारा प्रायोजित रहत, आ अो एे तरहक (दिल्लीक बाद) दोसर गोष्ठी रहत जकरा रमण-दरिहरे-बिहारी ८३म गोष्ठी सेहो कहता। अोतए "राडक़ सुख बलाय " आदि कथाक वाचन हएत। मेहथ बला गोष्ठी मे रमण-दरिहरे-बिहारी सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी प्रतिबन्धित छथि।
कहल जाइ छै जे सगर राति दीप जरय नव कथाकारक लेल ट्रेनिंग सदृश अछि। नव कथाकार कलमाएल जाइ छथि! मुदा सत्य की अछि? की एंकर प्रवृत्ति साहित्य अकादेमीसँ भिन्न अछि? की ऐपर कब्जा लेल साहित्ये अकादमी सन छल प्रपंच नै होइ छल!
आ ७९म सगर रातिक हीरन्द्र झा आदि द्वारा बहिष्कार आ रमणक ओतै जातिवादी उद्घोष उमेश पासवानक नै, मैथिलीक विरोध छल, कब्जाक राजनीतिक प्रारम्भ ७९म सगर रातिसँ पहिनहियो छल। ७४म सगर राति -हज़ारीबागमे प्रदीप बिहारी माला उठेबाक प्रस्ताव केलन्हि आ से छल मात्र दोसराक प्रस्ताव खसेबा लेल। अपन ग्रुपक क़ब्जा लेल मात्र ई प्रस्ताव छल। ओ अपन प्रस्ताव अपन ग्रुपक पक्षमे आपिस ल' लेलन्हि। ओ ई नाटक ७५म सगर रातिमे सेहो केलन्हि। तँ की ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधामे हुनकर उपयोग कएल जा रहल छन्हि आकि ओ ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधाक मुख्य कलाकार छथि?हुनकर रचनामे जान नै छन्हि मुदा घृणित राजनीतिमे जान छन्हि। आ साहित्य अकादेमी पुरस्कार एहने गुणपर देल जाइ छै, से चेतना समितिसँ माफी मांगि पएर पकड़ि ओ निर्लज्जतापूर्वक लेलन्हि। से ओ ऐ ब्लैकमेलिंग धंधाक मुख्य कलाकार छथि जकरा बुझल छै जे नीक रचना लिखबापर ध्यान देनाइ मूर्खता छै, ओइसँ प्राइज नै भेटै छै, साहित्य अकादेमी लेल जोड़-तोड़ चाही आ ओइमे ओ मास्टर छथि, मैथिली गेल तेलहण्डामे।
आ ऐ परिस्थिति मे नव कथाकारक ट्रेनिंग नै भेलै, जतेक लोक सगर रातिसँ जुड़ला ओइसँ बेसी हतोत्साहित क' मैथिली साहित्यसँ दूर क' देल गेला, नेट रिजल्ट माइनसमे रहल!
बहिष्कारक राजनीतिसँ सुपौल, देवघर आ नरहनक गोष्ठी प्रभावित रहल तँ कब्जाक राजनीतिक अन्तर्गत काठमाण्डूक सगर रातिमे कोनो स्थानीय साहित्यकारकेँ धीरेन्द्र प्रेम र्षि हवा नै लाग' देलखिन्ह जे एहन कोनो गोष्ठी हुअएबला अछि, मनोज मुक्ति ई सूचित करै छथि।
अशोक अविचल, श्याम दरिहरे, रमण आदि देवघरक आयोजक ओमप्रकाश झापर साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ सगर रातिक मान्यता देबा लेल ब्लैकमेलिंगक क' ई शर्त रखलन्हि जे तखने ओ संभ ऐमे सम्मिलित हेता आ नै तँ बहिष्कार करता।मुदा आरती कुमारीक हत्याक बाद ई पहिल मौका छल बलैकमेलर सभकेँ हरदा बजेबाक ; आ समीक्षा-प्रतिसमीक्षासँ बढ़ैत ई गोष्ठी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त केलक, बलैकमेलर सभक बहिष्कार ओकरा आर सबल बनेलकै। दरिहरे आयोजककेँ कहलन्हि जे साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ मान्यता सगर रातिक रूपये भेटए, तइ लेल मैथिली लेखक संघ,पटनाक बैसकीमे रमणक कहलासँ ओ ऐलेल फ़ोन केलखिन्ह। अविचल सेहो आयोजककेँ सएह कहलखिन्ह।
देवघर गोष्ठी ट्रेनिंग स्कूल सिद्ध भेल, रमण, दरिहरे आ बिहारी अबितथि तँ सिखितथि जे केना रचनामे ओ क्वालिटी आनि सकै छथि, मुदा ओ सभ प्रैकटिकल छथि, बुझल छन्हि प्राइज़ टा लेल लिखल जाइ छै आ से जोड़-तोड़सँ भेटै छै, क्वालिटीसँ नै, अविचल मे प्रतिभा लेशो मात्र नै छन्हि, हुनका कोनो ट्रेनिंग किछु नै द' सकतन्हि, से ओ नै आबि अपन टाइम बचेलथि आ से नीके केलथि।
सगर राति दीप जरयमे कव्ालिटी आबि जाएत तँ बिहारी-दरिहरे-रमण सन मेडियोकरकेँ के पूछत, से ओ सभ राड़केँ सुख बलायक लेखकक संग दोसर साहित्य अकादेमी गोष्ठी करता जत' ब्राह्मण युवा सभकेँ राड़केँ सुख बलाय सन् नीक कथा केना लिखल जाए तकर ट्रेनिंग रमण-बिहारी-दरिहरे द्वारा देल जाएत। नीके अछि, मूर्ख सभक प्रवेश सगर रातिमे थम्हत। आ परोक्ष रूपेँ ऐ लेल मैथिली साहित्य रमण-बिहारी-दरिहरेक आभारी रहत।
दरिहरे-बिहारी-रमणक बहिष्कारक रणनीति द्वारा सगर रातिपर कब्जाक राजनीति आरती कुमारीक संग भागलपुरमे चलि सकल मुदा वएह राजनीति २ सालक बाद देवघरमे तेनाकेँ फ़ेल भेल जे ओ सभ पहिने सगर रातिसँ पलायन केलन्हि आ फेर निकालि देल गेला। ब्राहम्णवादी भाषाक रूपमे विश्वमे ख्यात ऐ साहित्यमे कोन प्रक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक? सगर राति दीप जरयक ब्राहम्णवादी अनुष्ठानकेँ एकर स्वयंभू पुरोहित सभ द्वारा आरती कुमारीक बलि देल जा चुकल छल। भयक ऐ वातावरणमे ई परिवर्तन केना भेल जे रमण-बिहारी-दरिहरे नै बूझि सकला?
मैथिली भाषाक ब्राह्मणवादी चरित्रमे भाषाक संग ख़ूब खेल खेलाएल गेल छै। राड़क मतलब एत' छै (ब्राहम्णक नजरिमे) भुमिहार,राजपूत, कायस्थ सहित सभ आन जाति। अपन बच्चाकेँ यौ आ राड़क बुढ़बाकेँ हौ! कहबी मे सेहो बेइमानी, जेना- दस ब्राहम्ण दस पेट, दस राड़ एक पेट! मुदा हमर माँ कहै छथि जे ई कहबी मात्र ब्राहम्णमे छै, आन सभ कहै छथि- दस राड़ दस पेट, दस ब्राह्मण एक पेट। मुदा बिहारी सन मेडियोकर साहित्यकारकेँ ई सभ गप नै बुझल छन्हि- ओ बुझै छथि जे राड़केँ सुख बलाय तँ जगदीश प्रसाद मण्डलपर रमण-बिहारी-दरिहरे लिखबेने छथि। रमण आ दरिहरे तँ ठीक सोचै छथि मुदा बिहारी तँ कायस्थ छथि आ दरिहरे-रमणक परिभाषा अनुसार राड़केँ सुख बलाय जगदीश प्रसाद मण्डलक अतिरिक्त हुनके टा पर नै वरण समस्त मिथिलाक गएर ब्राहम्णकेँ देल गारि अछि।
विदेह घरे-घरे घुसि चुकल अछि, से ३१ मइ२०१४ केँ रमण-दरिहरे-बिहारीक "राड़केँ सुख बलाय"कथा गोष्ठीमे शामिल सभ ब्राहम्ण छद्म कथाकारक लिस्ट हमरा ०१ जून २०१४ क भोरमे चाही।
२. आब आउ सगर रातिकेँ खतम करबाक साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा आ ओकरा द्वारा मान्यताप्राप्त फ़र्ज़ी संस्था सभक पर।
३ रम ण साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखासँ लाखक लाख असाइनमेण्ट क़ताक सालसँ ल'रहल छथि, से हुनका ई भार देल गेलन्हि जे सगर रातिपर विदेहक प्रभावकेँ ओ ओहिना ख़त्म करथु जेना आरती कुमारीकेँ ओ बिहारी-दरिहरे संग मिलि क' ख़त्म केने रहथि। मुदा हुनकर एस्टीमेट ऐबेर गड़बड़ा गेलन्हि, मैथिली लग आब पाठक छलै, शक्ति छलै, स्तर छलै, से मेडियोकर रमण-बिहारी-दरिहरे नै बुझि सकला। ख़ून रंग आनै छै, चेन्हासी छोड़ै छै ़़़़........ख़ून खूनीकेँ ताकि लै छै़़़.
मिथिलामे दुर्गापूजामे मोटामोटी चन्दा ओसूलि क' पूजा होइ छै। बस रोकि क' चन्दा ओसूली सरस्वती पूजा लेल आब शुरू भ' गेल छै, पहिने नै होइ छलै, कारण ई पर्व व्यक्तिगत निष्ठासँ सम्बन्धित छल। ओ निष्ठा यज्ञोपवीत करबा क' मूर्खतापूर्वक मोछैल आ क्लीन शेव ( संगे प ाग पहिरने!) विद्यापतिक कोनो तत्कालीन वेशभूषाक अध्ययनसँ रहित जातिवादी कलाकार द्वारा बनाओल फोटोपर माल्यार्पणक विद्यापति पर्वमे सेहो नै भेटत। ई विद्यापति पर्व सभ , जातिवादी रंगमंच , साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा, प्रज्ञा संस्थान, साझा प्रकाशन आ सगर राति दीप जरय मैथिलीमे कट्टरता बढ़ेलक आकि घटेलक?
२. विश्वकर्मा पूजा, दुर्गापूजा आदि ई दाबा नै करैए जे ओ सभ मैथिली लेल काज करै छथि। मुदा ई सभ समाजमे मिलि काज केना करी से सिखबैए। एकर विपरीत विद्यापतिकेँ यज्ञोपवीत करबाकेँ जे सांस्कृतिक संस्थापर कब्जाक राजनीति सिखाओल गेल से जातिवादी रंगमंचमे पैसल, कोलकाताक कु र्मी-क्षत्रिय समाज मैथिलीसँ अलग क' देल गेल। छिट्टाक छिट्टा पोथी आ सम्मान मैथिल ब्राहम्ण आ कर्ण कायस्थ लेल रिज़र्व भ' गेल। दोसर जँ हिम्मत केलक तँ बुढ़ा सभ लफुआ युवाकेँ साहित्यकार बना क' हुलकाब' लगला। "राड़कँ सुख बलाय"क लेखक केँ श्याम दरिहरे, प्रदीप बिहारी आ रमानन्द झा रमण द्वारा हुलकाएब ऐ प्रक्रियाक टटका उदाहरण अछि। मुदा ई प्रक्रिया जे ५० सालसँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद आ कायस्थवादक संजीवनी बूटी छल कोना धराशायी भ' गेल। मैथिली साहित्यमे एहन की भ' रहल अछि, कोन ऐतिहासिक क्रिया- प्रतिक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक, आ जे रमण-बिहारी- दरिहरे आ हुनकर सभक आका साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ जातिवादी रंगमंच नै बूझि सकल?
३. सगर राति दीप जरय द्वारा ब्राहम्ण युवामे जे कट्टरता ढुकाओल जा रहल छल से जखन तोड़ल गेल तँ बिहारी- रमण- दरिहरे आ आका सभ बूझि नै सकल जे की भ' रहल अछि आ अन्ततः ओ सभ अपन पेशेन्स खतम क' लेलन्हि। मुदा ऐबेर तँ दुनियेँ उनटल छल।
रहुआ संग्रामक कथा गोष्ठीमे रमणजी सहित सभ निर्णय लेलन्हि जे राति भरि कियो नै सुतता, मुदा भोजनसँ पहिने जखन सभ नामी(!!) कथाकारक पाठ क' सुति रहला तँ भोरहरबामे जे युवा सभ नामी कथाकार लोकनिक कथा सुनने रहथि, तिनकर नम्बर एलन्हि। आशीष अनचिन्हार जखन कथा पढ़ैले एला तँ संचालक ओंघा रहल छला आ मात्र अध्यक्ष शिवशंकर श्रीनिवास जागल रहथि, नै सुतबाक निर्णय लेनहार रमणजी फोंफ काटि रहल रहथि, जकर विरोधमे अध्यक्षक कहलाक उपरान्तो आशीष अनचिन्हार कथा पाठ करबा सँ मना क' देलन्हि; ओ पोस्ट माडर्न कथा बादमे "विदेह लघु कथा" मे छपल।
मुदा ब्राह्मणवादी सेंसर प्रक्रिया एतेक जब्बर छै जे ने आयोजक, ने रमण आ ने अध्यक्ष- संचालकक फर्जी सगर रातिक इतिहासमे एकर वर्णन भेटत। अरुचिकर गपकेँ झँापि देबाक ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति एकर कारण अछि।
८१ टा सगर राति भेबो कएल आकि नै, लोक हमरासँ पुछै छथि। पहिने डाकसँ रचना आबै आ से नामी (!!) कथा सभ पढ़ल जाइ छलै, जे युवा सभ सदेह आबथि तिनकर नम्बर एबे नै करन्हि, एबो करन्हि तँ सुतलाहा बेरमे, मुन्नाजी जखन एकर विरोध केलन्हि तँ वएह कहल गेल, गप झाँपू, रजिस्टरमे ओइ नै एनिहार सभक सेहो उपस्थिति दर्ज भेल तेँ। बहुत कथा गोष्ठीमे दसो टा कथाकार नै एला, मुदा उपस्तिथि रजिस्टरमे बहुत रास उपस्थित भेटता, किछु एबे नै केला, किछु डाकसँ एला(!!) आ किछु हाजरी बना क' निपत्ता भ' गेला सेहो। जेना युद्धमे ३००० सँ कम मुइने ओकरा युद्ध नै कहल जाइए, तहिना दस टा सँ कम उपस्थितिकेँ सगर राति केना कहल जा सकत? ८१ क संख्या बड्ड कम भ' जाएत, ८१ बड्ड बेशी होइ छै, एतेमे तँ शान्त क्रान्ति भ' जइतए, से किए नै भेल तकर कारण ऊपर देल अछि।
ऐ समानान्तर आन्दोलनमे हमरा सहयोग चाही बा विरोध, धनाकर ठाकुर आ गंगेश गुंजनक "आइडियोजिकल न्यूट्रेलिटी"क मतलब सेहो एकेटा छै, आ से छै समानान्तर धाराक विरोध।
आ इतिहास हमरो मूल्याँकन करत आ हुनको ( विरोधी आ न्यूट्रल फिफ्थ कालमनिस्टक) ।
बहुत लोक ऐ तरहक कमेण्ट पछिला ६ सालसँ द' रहल छथि जे आब विदेह बदलि गेलै, ओकरा सभ सन भ' गेलै।विदेहक उद्देश्य ने बदलल छै आ ने बदलतै। कोन व्याख्या ककर तुष्टीकरण छै से स्पष्ट बिन केने ऐ तरहक कमेण्ट कएल जाएत अछि। हुनकर आशा जँ ई रहैए जे मैथिली साहित्य केँ युवाक उत्साह विदेहक माध्यमसँ नव दिशा प्राप्त करत आ से आब लागि रहल अछि जे से आब व्यक्तिगत कुण्ठाक मंचक रूपमे दुरुपयोगी भ' गेल अछि तँ ऐ सम्बन्ध में हमर यएह कहब अछि जे सत्यक कियो उपयोग क' सकैए आ कियो दुरुपयोग , जे हुनका दुरुपयोग आ व्यक्तिगत कुण्ठाक तुष्टीकरण आब लागि रहल छन्हि से बहुत गोटेकेँ ६ साल पहिनहिये सँ लागि रहल छन्हि, आ तकर व्याख्या हमरा लग यएह अछि जे ओ सभ मात्र विदेहसँ सिम्बोलिक विरोधक आशा करैत रहथि, असली परिवर्तन नै चाहनहारकेँ यैह असली ब्राह्मणवाद बुझेतन्हि, कारण बदलल पात्र सँ ब्राहम्णवादी मानसिकता उद्वेलित भ' गेल छै, ओ गेल तँ हम अबितौं मुदा ई सभ के आबि गेल। अहाँकेँ बुझबाक चाही जे मैथिली आगाँ एलै, जकरा जतेक प्रतिभा छलै ओ विदेहक माध्यमसँ ततेक सिखलकै आ ततेक आगां बढ़लै आ बढ़तै। किछु लोक जँ स्वार्थक लेल विदेहसँ जुड़ला मुदा आनुवंशिक जाति श्रेष्ठता हुनकासँ विदेहक निश्छल प्रयासोक बावजूद नै गेलन्हि, आ जइ विदेहकेँ ओ साहित्य आन्दोलन बुझै छला ( हृदयसँ नै) आ विदेहकेँ इमोशनल ब्लैकमेल, धमकी , हमरा आ हमरा परिवारकेँ ईमेल- फोनसँ गारि, छोड़ि क' जेबाक धमकी ( छोड़ि क' जेबाक धमकी देनिहारमे संयोगसँ अखन धरि मात्र ब्राहमणे छथि जिनका लगै छन्हि जे सिमबोलिक प्रोटेस्ट धरि मात्र विदेह सीमित रहितए), जे आब अहँू वएह (!!), बुझलौं प्राइज़ लेल, फलनाकेँ दिआबए चाहै छिऐ, व्यक्तिगत राजनीति , विदेहक भला नै हएत, ई सभ ६ सालसँ सुनि- सुनि हमर कान पाकि गेल अछि। रामदेव झा आ अमर पहिनेँ कहैत रहथि, हम अपन कनियाँकेँ पुरस्कार दिआब' चाहै छिऐ, सभ हँसि देलकन्हि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग निर्वस्त्र अछि दोसराकेँ की सम्मानित करत तँ आब कहि रहल छथि जे उमेश मण्डल , राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरकेँ हम पुरस्कार दिआब' चाहै छिऐ। मोहन भारद्वाज देवशंकर नवीनक सोझाँ कहै छथि जे गजेन्द्र ठाकुर पागले ने छै जेना लखन झा छलै। दरिहरे सेहो लाल बुझक्कर छथि, हुनका आब बुझबामे आबि गेलन्हि जे हमरा साहित्य अकादमी सँ झगड़ा अछि तेँ, व्यक्तिगत राजनीति तेँ। बिहारी मुन्नाजीकेँ फ़ोन करै छथि आ कहै छथि मात्र जगदीशे मण्डलकेँ किए आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि (!!) ब्राहम्णवादी मानसिकता ई छिऐ, जे जगदीश मण्डल मेरिटसँ नै , बढ़ेलासँ आगाँ बढंल छथि जेना मैथिली साहित्यमे पहिने होइ छलै। प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि जे विदेह किए जातिवादी रंगमंचक विरोध करैए, किए समानान्तर परम्परा भ' क' मूल परम्पराक गुणवत्ताक समीक्षा करैए, समानान्तर तँ मूलसँ मिलित्े नै छै तँ किए हमर सभक नाम लै छी , अलग रहू, यएह छिऐ असल ब्राहम्णवाद- कायस्थवाद। चर्चे नै कर, काने बात नै दे!! आ ईहो संयोगे अछि जे जइ २-४ टा लोककेँ दिक़्क़त छन्हि से ब्राहम्णवादी प्रवृत्तक छथि, अनका ई दिक़्क़त किए नै छन्हि। पछिला ६ सालसँ विदेह जहिना छल ओहने रहत, अगिला कमसँ कम ३० साल धरि मैथिली साहित्य आब अहिना चलत। विदेहमे जकरा जे मेरिट छै ओ ओतेक बढ़त, चाहे ओ कोनो जाति, धर्म, क्षेत्रक होथि। विदेह जिनका बदलल लागि रहल छन्हि ओ स्वयंकेँ देखथु जे ओ तँ नै बदलि गेल छथि?
आब फेर आउ सगर राति दीप जरय पर।
अलिखित संविधानक नामपर बहुत रास खेल भेलै। ई मुख्य रूपेँ कथावाचनक गोष्ठी छिऐ मुदा एत' आलोचनात्मक आलेख पढ़बाक सेहो अनुमति छै आ से जँ अहाँक नाम रमण अछि तखने टा, से जखन कबिलपुर गोष्ठीमे मुन्नाजी विहनि कथा पर आलेख पढ़बाक अनुमति मांगलन्हि तँ से अनुमति नै भेटलन्हि, आ एत' अलिखित संविधानक सोंगर लेल गेल, आ तकर दूटा कारण , एक तँ मुन्नाजीक नाम रमण नै छियन्हि, दोसर विहनि कथाक कनसेप्ट विदेह द्वारा आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि से तकर विरोध, किए नै ओ कनसेप्ट कतबो वैज्ञानिक होइ।
झंझारपुर गोष्ठी मे जे एला तिनकर कथाक पाठ नै भेलन्हि मुदा डाकसँ आएल कथाक पाठ भेल, आ जँ अहाँ अविनाश छी सुमन-अमरकेँ गारि लिखै छी यात्रीक नामपर , तँ अहूँ कथाकार, कवि सभ , नै रहितो , छी, देवघर गोष्ठीक संयोजकत्व सेहो बोनसमे अहाँकेँ भेटत। से घोंघरडीहा गोष्ठीमे जिनका सभकेँ कथा नै पढ़' देल गेलन्हि, ओ सभ युवा एकर विरोध केलन्हि, किछुकेँ कथा पढ़' देल गेलन्हि आ जिनका नै पढ़' देल गेलन्हि से अगिला कथा गोष्ठीसँ एनाइ बन्द क' देलन्हि।
जे सभ मैथिली फिल्म आ डोक्यूमेण्टरीक नामपर लोकसँ पाइ ठकलन्हि से रमण- दरिहरे- बिहारीक विदेहक विरोधमे संगी छथि, जे युवा प्राइज़ लेल मैथिलीयोमे लिखना्हि, जातिवादी सभसँ मिलि साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कार लेलन्हि ओ तँ स्वाभाविक रूँपे हुनकर संगी हेता।
विदेह उमेश मण्डल आ जगदीश प्रसाद मण्डलक कान्हपर बंदूक राखने अछि, यूज़ क' रहल अछि, आ जँ हुनकर सभक रचना नै छप' देल जाइत, "तिल बहब ने" छपबासँ पहिने , सकरबाबल जाइत, तखन सभ ठीक छल। ब्राहम्णवादी सभ जेकाँ विदेह कोनो काज कएलासँ पहिने "तिल बहब ने"क शर्त क़रार नै करबैए आ सएह कारण अछि , नव ब्राह्मणवादी ई नै बूझि सकला, धू, एहनो क़तौ भेलैए। बिनु जान- पहिचान, भेंट- घांटक मात्र मैथिलीक नामपर सभ एकत्रित भ' गेल से हुनका अजगुत लगलन्हि।
प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि आ ई विचार रामदेव झाक सेहो छन्हि जे जखन विदेह साहित्य अकादेमीक समानान्तर पुरस्कार शुरू कैए देलक तखन साहित्य अकादेमी लेल शोर किए? माने ओकरा बकसि देल जाए! अशोक अविचल शिवकुमार जीकेँ कहै छथि जे मायानाथ झा, आनन्द कुमार झा ( ऐमे गुणनाथ झा जोड़ि लिअ) आदि जिनका सभक चर्चा विदेह केलक सभकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटलै, तँ हुनका उत्तर भेटल छलन्हि, जँ हुनकर सभक नाममे झा नै मण्डल रहितन्हि तँ की ई संभव छल?
आ साहित्य अकादेमी कोनो मनुक्ख नै छिऐ जकरा संग भतबरी कएल जाएत आ ने ककरो पैतृक संपत्ति जकर उपयोग ब्राहम्ण कायस्थक तथाकथित साहित्यकारकेँ ख़ैरात बँटबा लेल आब कएल जा सकत।
आ हमरा विषयमे जखन सभकेँ बुझबामे आबि गेलन्हि जे नै रौ, ई अपना सभ सन नै अछि, विदेह अपना सभ सन नै छौ, तँ हुनका सभ केँ आर चिन्ता लागि गेलन्हि! रौ कहीं, ईं हो सभ हमरे सभ सन, कहीन, ई जे अपने प्राइज़ लेब' चाहैए बा दोसराकेँ दिआब' चाहैए....
ब्राह्मणवाद मैथिलीकेँ गीरि गेलै, आ सभकेँ बुझल छै जे दूटा सहोदरो एक रंग नै होइए, से पूरा जाति नीक बा अधला हेतै ई कनसेप्ट विदेहक नै छै, ओ तँ ब्राह्मणवादी कनसेप्ट छिऐ।
अतुलेश्वर झा छथि ओना तँ ब्राहम्णवाादक विरोधमे रहथि मुदा पाग आ विद्यापतिक हमर लेख क बाद अलग भ' गेला़, आ एहेन बहुत रास लोक छथि, प्रेम चन्द्र पंकज आ अभय दासकेँ कोनो ने कोनो बात ल' क' विदेहसँ घृणा भ' गेलन्हि, आ ई गप ओ सभ मुन्नाजीकेँ सूचित केलन्हि जे ओ लोकनि विदेह पढ़नाइ आब छोड़ि देलन्हि, प्राय: आब ओ सभ चोरा नुका क' विदेह पढ़ै छथि, कारण सभ गतिविधिक जानकारी हुनका सभकेँ रहै छन्हि।
आब सगर राति पर आउ, यात्री दिससँ सुमन- अमर केँ गारि देनहार आ अमर- सुमन दिससँ यात्रीकेँ गारि देनहार, मैथिली साहित्यमे ब्राहम्णवाद बचेबाक लेल विदेहक विरुद्ध दरिहरे- रमण- बिहारीक संग आबि गेल छथि अंतिम लड़ाइ लड़बा लेल।


सगर राति दीप जरयक इतिहास- कथाक कथा

सगर राति दीप जरयक इतिहास जे रमण द्वारा परसल जा रहल अछि, ओइमे एकर प्रारम्भ केना भेलसँ ल' क' अखन धरिक इतिहास मे बहुत रास विसंगति अछि । एकर प्रारम्भ केना भेलसँ ल' क' अखन धरिक इतिहासमे बहुत गोटेक योगदान बढ़ा क', बहुत गोटेक घंटा क', बहुत गोटेक परिवर्तित क' क' प्रस्तुत काल गेल तँ बहुत गोटे निपत्ता क' जेल गेला। कहल गेल जे ई स्वायत्त संस्था अछि मुदा चेतना समितिक दिससँ रमण आ अजित आजाद सम्मिलित होइत रहला आ जत' कियो माला नै उठेलक ओत' ई लोकनि चेतना समिति दिससँ माला उठेलन्हि आ संयोजकमे चेतना समितिक नाम नै आन नाम इतिहास बनबै लेल गेल गेल। चेतना समिति ( गौरीनाथक सूचनाक अनुसार) जखन गौरीनाथ, अग्निपुष्प आ प्रदीप बिहारी पर लिखित प्रतिबन्ध लगेलक तकरार बाद बिहारी द्वारा लिखित माफी ऐ मैरेज हॅाल ( चेतना समिति) सँ माँगल गेल, फेर हुनका रचना लेल नै, वरन ऐ कृत्य लेल अकादमी पुरस्कार देल गेल आ ओ सेहो ऐ मैरेज हॅालक प्रतिनिधि भ' गेला। फेर ई तिकड़ी श्याम देवघरे संग मिलि क' सगर रातिमे की सभ केलक से रमणक जातिवादी इतिहासमे नै भेटत।
की छल ओइ सगर रातिक रजिस्टरमे जकरा रमण कहि रहल छथि जे विभारानी हेरा देलन्हि। की ई रजिस्टर हेरा गेल बा हेरा जाइ देल गेल। मुदा किछु गप जे नै रमणकेँ बुझा छन्हि ने विभा । रानीकेँ से अछि जे आरती कुमारी अपन मृत्युसँ २-३ दिन पहिने ओकर फोटो स्टेट उमेश मण्डलकेँ पठा देलखिन्ह। ओ चाहितथि तँ कोने झारे झाकेँ सेहो पठा सकैत रहथि, मुदा हुनका झारेझा सभपर विश्वास नै छलन्हि, किए नै छलन्हि? कहल गेल छे जे शोनित अपन निशान छोड़ते अछि। शीघ्र सगर रातिक असली इतिहास।
दरभंगा बला गोष्ठी , जे ३१ म इ २०१४ केँ दरिहरे- रमण- बिहारी द्वारा साहित्य अकादेमी आ ऒकरा द्वारा मान्यता प्राप्त फर्जी मैथिली संस्था सभक संग रमण-दरिहरे-बिहारी सन - सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी तथाकथित साहित्यकार सभ द्वारा प्रायोजित रहत, आ अो एे तरहक (दिल्लीक बाद) दोसर गोष्ठी रहत जकरा रमण-दरिहरे-बिहारी ८३म गोष्ठी सेहो कहता। अोतए "राडक़ सुख बलाय " आदि कथाक वाचन हएत। मेहथ बला गोष्ठी मे रमण-दरिहरे-बिहारी सन जातिवादी ब्राहमणवादी-कायस्थवादी प्रतिबन्धित छथि।
कहल जाइ छै जे सगर राति दीप जरय नव कथाकारक लेल ट्रेनिंग सदृश अछि। नव कथाकार कलमाएल जाइ छथि! मुदा सत्य की अछि? की एंकर प्रवृत्ति साहित्य अकादेमीसँ भिन्न अछि? की ऐपर कब्जा लेल साहित्ये अकादमी सन छल प्रपंच नै होइ छल!
आ ७९म सगर रातिक हीरन्द्र झा आदि द्वारा बहिष्कार आ रमणक ओतै जातिवादी उद्घोष उमेश पासवानक नै, मैथिलीक विरोध छल, कब्जाक राजनीतिक प्रारम्भ ७९म सगर रातिसँ पहिनहियो छल। ७४म सगर राति -हज़ारीबागमे प्रदीप बिहारी माला उठेबाक प्रस्ताव केलन्हि आ से छल मात्र दोसराक प्रस्ताव खसेबा लेल। अपन ग्रुपक क़ब्जा लेल मात्र ई प्रस्ताव छल। ओ अपन प्रस्ताव अपन ग्रुपक पक्षमे आपिस ल' लेलन्हि। ओ ई नाटक ७५म सगर रातिमे सेहो केलन्हि। तँ की ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधामे हुनकर उपयोग कएल जा रहल छन्हि आकि ओ ऐ ब्लैकमेलिंगक धंधाक मुख्य कलाकार छथि?हुनकर रचनामे जान नै छन्हि मुदा घृणित राजनीतिमे जान छन्हि। आ साहित्य अकादेमी पुरस्कार एहने गुणपर देल जाइ छै, से चेतना समितिसँ माफी मांगि पएर पकड़ि ओ निर्लज्जतापूर्वक लेलन्हि। से ओ ऐ ब्लैकमेलिंग धंधाक मुख्य कलाकार छथि जकरा बुझल छै जे नीक रचना लिखबापर ध्यान देनाइ मूर्खता छै, ओइसँ प्राइज नै भेटै छै, साहित्य अकादेमी लेल जोड़-तोड़ चाही आ ओइमे ओ मास्टर छथि, मैथिली गेल तेलहण्डामे।
आ ऐ परिस्थिति मे नव कथाकारक ट्रेनिंग नै भेलै, जतेक लोक सगर रातिसँ जुड़ला ओइसँ बेसी हतोत्साहित क' मैथिली साहित्यसँ दूर क' देल गेला, नेट रिजल्ट माइनसमे रहल!
बहिष्कारक राजनीतिसँ सुपौल, देवघर आ नरहनक गोष्ठी प्रभावित रहल तँ कब्जाक राजनीतिक अन्तर्गत काठमाण्डूक सगर रातिमे कोनो स्थानीय साहित्यकारकेँ धीरेन्द्र प्रेम र्षि हवा नै लाग' देलखिन्ह जे एहन कोनो गोष्ठी हुअएबला अछि, मनोज मुक्ति ई सूचित करै छथि।
अशोक अविचल, श्याम दरिहरे, रमण आदि देवघरक आयोजक ओमप्रकाश झापर साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ सगर रातिक मान्यता देबा लेल ब्लैकमेलिंगक क' ई शर्त रखलन्हि जे तखने ओ संभ ऐमे सम्मिलित हेता आ नै तँ बहिष्कार करता।मुदा आरती कुमारीक हत्याक बाद ई पहिल मौका छल बलैकमेलर सभकेँ हरदा बजेबाक ; आ समीक्षा-प्रतिसमीक्षासँ बढ़ैत ई गोष्ठी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त केलक, बलैकमेलर सभक बहिष्कार ओकरा आर सबल बनेलकै। दरिहरे आयोजककेँ कहलन्हि जे साहित्य अकादेमीक गोष्ठी केँ मान्यता सगर रातिक रूपये भेटए, तइ लेल मैथिली लेखक संघ,पटनाक बैसकीमे रमणक कहलासँ ओ ऐलेल फ़ोन केलखिन्ह। अविचल सेहो आयोजककेँ सएह कहलखिन्ह।
देवघर गोष्ठी ट्रेनिंग स्कूल सिद्ध भेल, रमण, दरिहरे आ बिहारी अबितथि तँ सिखितथि जे केना रचनामे ओ क्वालिटी आनि सकै छथि, मुदा ओ सभ प्रैकटिकल छथि, बुझल छन्हि प्राइज़ टा लेल लिखल जाइ छै आ से जोड़-तोड़सँ भेटै छै, क्वालिटीसँ नै, अविचल मे प्रतिभा लेशो मात्र नै छन्हि, हुनका कोनो ट्रेनिंग किछु नै द' सकतन्हि, से ओ नै आबि अपन टाइम बचेलथि आ से नीके केलथि।
सगर राति दीप जरयमे कव्ालिटी आबि जाएत तँ बिहारी-दरिहरे-रमण सन मेडियोकरकेँ के पूछत, से ओ सभ राड़केँ सुख बलायक लेखकक संग दोसर साहित्य अकादेमी गोष्ठी करता जत' ब्राह्मण युवा सभकेँ राड़केँ सुख बलाय सन् नीक कथा केना लिखल जाए तकर ट्रेनिंग रमण-बिहारी-दरिहरे द्वारा देल जाएत। नीके अछि, मूर्ख सभक प्रवेश सगर रातिमे थम्हत। आ परोक्ष रूपेँ ऐ लेल मैथिली साहित्य रमण-बिहारी-दरिहरेक आभारी रहत।
दरिहरे-बिहारी-रमणक बहिष्कारक रणनीति द्वारा सगर रातिपर कब्जाक राजनीति आरती कुमारीक संग भागलपुरमे चलि सकल मुदा वएह राजनीति २ सालक बाद देवघरमे तेनाकेँ फ़ेल भेल जे ओ सभ पहिने सगर रातिसँ पलायन केलन्हि आ फेर निकालि देल गेला। ब्राहम्णवादी भाषाक रूपमे विश्वमे ख्यात ऐ साहित्यमे कोन प्रक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक? सगर राति दीप जरयक ब्राहम्णवादी अनुष्ठानकेँ एकर स्वयंभू पुरोहित सभ द्वारा आरती कुमारीक बलि देल जा चुकल छल। भयक ऐ वातावरणमे ई परिवर्तन केना भेल जे रमण-बिहारी-दरिहरे नै बूझि सकला?
मैथिली भाषाक ब्राह्मणवादी चरित्रमे भाषाक संग ख़ूब खेल खेलाएल गेल छै। राड़क मतलब एत' छै (ब्राहम्णक नजरिमे) भुमिहार,राजपूत, कायस्थ सहित सभ आन जाति। अपन बच्चाकेँ यौ आ राड़क बुढ़बाकेँ हौ! कहबी मे सेहो बेइमानी, जेना- दस ब्राहम्ण दस पेट, दस राड़ एक पेट! मुदा हमर माँ कहै छथि जे ई कहबी मात्र ब्राहम्णमे छै, आन सभ कहै छथि- दस राड़ दस पेट, दस ब्राह्मण एक पेट। मुदा बिहारी सन मेडियोकर साहित्यकारकेँ ई सभ गप नै बुझल छन्हि- ओ बुझै छथि जे राड़केँ सुख बलाय तँ जगदीश प्रसाद मण्डलपर रमण-बिहारी-दरिहरे लिखबेने छथि। रमण आ दरिहरे तँ ठीक सोचै छथि मुदा बिहारी तँ कायस्थ छथि आ दरिहरे-रमणक परिभाषा अनुसार राड़केँ सुख बलाय जगदीश प्रसाद मण्डलक अतिरिक्त हुनके टा पर नै वरण समस्त मिथिलाक गएर ब्राहम्णकेँ देल गारि अछि।
विदेह घरे-घरे घुसि चुकल अछि, से ३१ मइ२०१४ केँ रमण-दरिहरे-बिहारीक "राड़केँ सुख बलाय"कथा गोष्ठीमे शामिल सभ ब्राहम्ण छद्म कथाकारक लिस्ट हमरा ०१ जून २०१४ क भोरमे चाही।
२. आब आउ सगर रातिकेँ खतम करबाक साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा आ ओकरा द्वारा मान्यताप्राप्त फ़र्ज़ी संस्था सभक पर।
३ रम ण साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखासँ लाखक लाख असाइनमेण्ट क़ताक सालसँ ल'रहल छथि, से हुनका ई भार देल गेलन्हि जे सगर रातिपर विदेहक प्रभावकेँ ओ ओहिना ख़त्म करथु जेना आरती कुमारीकेँ ओ बिहारी-दरिहरे संग मिलि क' ख़त्म केने रहथि। मुदा हुनकर एस्टीमेट ऐबेर गड़बड़ा गेलन्हि, मैथिली लग आब पाठक छलै, शक्ति छलै, स्तर छलै, से मेडियोकर रमण-बिहारी-दरिहरे नै बुझि सकला। ख़ून रंग आनै छै, चेन्हासी छोड़ै छै ़़़़........ख़ून खूनीकेँ ताकि लै छै़़़.
मिथिलामे दुर्गापूजामे मोटामोटी चन्दा ओसूलि क' पूजा होइ छै। बस रोकि क' चन्दा ओसूली सरस्वती पूजा लेल आब शुरू भ' गेल छै, पहिने नै होइ छलै, कारण ई पर्व व्यक्तिगत निष्ठासँ सम्बन्धित छल। ओ निष्ठा यज्ञोपवीत करबा क' मूर्खतापूर्वक मोछैल आ क्लीन शेव ( संगे प ाग पहिरने!) विद्यापतिक कोनो तत्कालीन वेशभूषाक अध्ययनसँ रहित जातिवादी कलाकार द्वारा बनाओल फोटोपर माल्यार्पणक विद्यापति पर्वमे सेहो नै भेटत। ई विद्यापति पर्व सभ , जातिवादी रंगमंच , साहित्य अकादेमीक मैथिली शाखा, प्रज्ञा संस्थान, साझा प्रकाशन आ सगर राति दीप जरय मैथिलीमे कट्टरता बढ़ेलक आकि घटेलक?
२. विश्वकर्मा पूजा, दुर्गापूजा आदि ई दाबा नै करैए जे ओ सभ मैथिली लेल काज करै छथि। मुदा ई सभ समाजमे मिलि काज केना करी से सिखबैए। एकर विपरीत विद्यापतिकेँ यज्ञोपवीत करबाकेँ जे सांस्कृतिक संस्थापर कब्जाक राजनीति सिखाओल गेल से जातिवादी रंगमंचमे पैसल, कोलकाताक कु र्मी-क्षत्रिय समाज मैथिलीसँ अलग क' देल गेल। छिट्टाक छिट्टा पोथी आ सम्मान मैथिल ब्राहम्ण आ कर्ण कायस्थ लेल रिज़र्व भ' गेल। दोसर जँ हिम्मत केलक तँ बुढ़ा सभ लफुआ युवाकेँ साहित्यकार बना क' हुलकाब' लगला। "राड़कँ सुख बलाय"क लेखक केँ श्याम दरिहरे, प्रदीप बिहारी आ रमानन्द झा रमण द्वारा हुलकाएब ऐ प्रक्रियाक टटका उदाहरण अछि। मुदा ई प्रक्रिया जे ५० सालसँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद आ कायस्थवादक संजीवनी बूटी छल कोना धराशायी भ' गेल। मैथिली साहित्यमे एहन की भ' रहल अछि, कोन ऐतिहासिक क्रिया- प्रतिक्रिया चलि रहल अछि जे ई संभव केलक, आ जे रमण-बिहारी- दरिहरे आ हुनकर सभक आका साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग आ जातिवादी रंगमंच नै बूझि सकल?
३. सगर राति दीप जरय द्वारा ब्राहम्ण युवामे जे कट्टरता ढुकाओल जा रहल छल से जखन तोड़ल गेल तँ बिहारी- रमण- दरिहरे आ आका सभ बूझि नै सकल जे की भ' रहल अछि आ अन्ततः ओ सभ अपन पेशेन्स खतम क' लेलन्हि। मुदा ऐबेर तँ दुनियेँ उनटल छल।
रहुआ संग्रामक कथा गोष्ठीमे रमणजी सहित सभ निर्णय लेलन्हि जे राति भरि कियो नै सुतता, मुदा भोजनसँ पहिने जखन सभ नामी(!!) कथाकारक पाठ क' सुति रहला तँ भोरहरबामे जे युवा सभ नामी कथाकार लोकनिक कथा सुनने रहथि, तिनकर नम्बर एलन्हि। आशीष अनचिन्हार जखन कथा पढ़ैले एला तँ संचालक ओंघा रहल छला आ मात्र अध्यक्ष शिवशंकर श्रीनिवास जागल रहथि, नै सुतबाक निर्णय लेनहार रमणजी फोंफ काटि रहल रहथि, जकर विरोधमे अध्यक्षक कहलाक उपरान्तो आशीष अनचिन्हार कथा पाठ करबा सँ मना क' देलन्हि; ओ पोस्ट माडर्न कथा बादमे "विदेह लघु कथा" मे छपल।
मुदा ब्राह्मणवादी सेंसर प्रक्रिया एतेक जब्बर छै जे ने आयोजक, ने रमण आ ने अध्यक्ष- संचालकक फर्जी सगर रातिक इतिहासमे एकर वर्णन भेटत। अरुचिकर गपकेँ झँापि देबाक ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति एकर कारण अछि।
८१ टा सगर राति भेबो कएल आकि नै, लोक हमरासँ पुछै छथि। पहिने डाकसँ रचना आबै आ से नामी (!!) कथा सभ पढ़ल जाइ छलै, जे युवा सभ सदेह आबथि तिनकर नम्बर एबे नै करन्हि, एबो करन्हि तँ सुतलाहा बेरमे, मुन्नाजी जखन एकर विरोध केलन्हि तँ वएह कहल गेल, गप झाँपू, रजिस्टरमे ओइ नै एनिहार सभक सेहो उपस्थिति दर्ज भेल तेँ। बहुत कथा गोष्ठीमे दसो टा कथाकार नै एला, मुदा उपस्तिथि रजिस्टरमे बहुत रास उपस्थित भेटता, किछु एबे नै केला, किछु डाकसँ एला(!!) आ किछु हाजरी बना क' निपत्ता भ' गेला सेहो। जेना युद्धमे ३००० सँ कम मुइने ओकरा युद्ध नै कहल जाइए, तहिना दस टा सँ कम उपस्थितिकेँ सगर राति केना कहल जा सकत? ८१ क संख्या बड्ड कम भ' जाएत, ८१ बड्ड बेशी होइ छै, एतेमे तँ शान्त क्रान्ति भ' जइतए, से किए नै भेल तकर कारण ऊपर देल अछि।
ऐ समानान्तर आन्दोलनमे हमरा सहयोग चाही बा विरोध, धनाकर ठाकुर आ गंगेश गुंजनक "आइडियोजिकल न्यूट्रेलिटी"क मतलब सेहो एकेटा छै, आ से छै समानान्तर धाराक विरोध।
आ इतिहास हमरो मूल्याँकन करत आ हुनको ( विरोधी आ न्यूट्रल फिफ्थ कालमनिस्टक) ।
बहुत लोक ऐ तरहक कमेण्ट पछिला ६ सालसँ द' रहल छथि जे आब विदेह बदलि गेलै, ओकरा सभ सन भ' गेलै।विदेहक उद्देश्य ने बदलल छै आ ने बदलतै। कोन व्याख्या ककर तुष्टीकरण छै से स्पष्ट बिन केने ऐ तरहक कमेण्ट कएल जाएत अछि। हुनकर आशा जँ ई रहैए जे मैथिली साहित्य केँ युवाक उत्साह विदेहक माध्यमसँ नव दिशा प्राप्त करत आ से आब लागि रहल अछि जे से आब व्यक्तिगत कुण्ठाक मंचक रूपमे दुरुपयोगी भ' गेल अछि तँ ऐ सम्बन्ध में हमर यएह कहब अछि जे सत्यक कियो उपयोग क' सकैए आ कियो दुरुपयोग , जे हुनका दुरुपयोग आ व्यक्तिगत कुण्ठाक तुष्टीकरण आब लागि रहल छन्हि से बहुत गोटेकेँ ६ साल पहिनहिये सँ लागि रहल छन्हि, आ तकर व्याख्या हमरा लग यएह अछि जे ओ सभ मात्र विदेहसँ सिम्बोलिक विरोधक आशा करैत रहथि, असली परिवर्तन नै चाहनहारकेँ यैह असली ब्राह्मणवाद बुझेतन्हि, कारण बदलल पात्र सँ ब्राहम्णवादी मानसिकता उद्वेलित भ' गेल छै, ओ गेल तँ हम अबितौं मुदा ई सभ के आबि गेल। अहाँकेँ बुझबाक चाही जे मैथिली आगाँ एलै, जकरा जतेक प्रतिभा छलै ओ विदेहक माध्यमसँ ततेक सिखलकै आ ततेक आगां बढ़लै आ बढ़तै। किछु लोक जँ स्वार्थक लेल विदेहसँ जुड़ला मुदा आनुवंशिक जाति श्रेष्ठता हुनकासँ विदेहक निश्छल प्रयासोक बावजूद नै गेलन्हि, आ जइ विदेहकेँ ओ साहित्य आन्दोलन बुझै छला ( हृदयसँ नै) आ विदेहकेँ इमोशनल ब्लैकमेल, धमकी , हमरा आ हमरा परिवारकेँ ईमेल- फोनसँ गारि, छोड़ि क' जेबाक धमकी ( छोड़ि क' जेबाक धमकी देनिहारमे संयोगसँ अखन धरि मात्र ब्राहमणे छथि जिनका लगै छन्हि जे सिमबोलिक प्रोटेस्ट धरि मात्र विदेह सीमित रहितए), जे आब अहँू वएह (!!), बुझलौं प्राइज़ लेल, फलनाकेँ दिआबए चाहै छिऐ, व्यक्तिगत राजनीति , विदेहक भला नै हएत, ई सभ ६ सालसँ सुनि- सुनि हमर कान पाकि गेल अछि। रामदेव झा आ अमर पहिनेँ कहैत रहथि, हम अपन कनियाँकेँ पुरस्कार दिआब' चाहै छिऐ, सभ हँसि देलकन्हि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभाग निर्वस्त्र अछि दोसराकेँ की सम्मानित करत तँ आब कहि रहल छथि जे उमेश मण्डल , राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरकेँ हम पुरस्कार दिआब' चाहै छिऐ। मोहन भारद्वाज देवशंकर नवीनक सोझाँ कहै छथि जे गजेन्द्र ठाकुर पागले ने छै जेना लखन झा छलै। दरिहरे सेहो लाल बुझक्कर छथि, हुनका आब बुझबामे आबि गेलन्हि जे हमरा साहित्य अकादमी सँ झगड़ा अछि तेँ, व्यक्तिगत राजनीति तेँ। बिहारी मुन्नाजीकेँ फ़ोन करै छथि आ कहै छथि मात्र जगदीशे मण्डलकेँ किए आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि (!!) ब्राहम्णवादी मानसिकता ई छिऐ, जे जगदीश मण्डल मेरिटसँ नै , बढ़ेलासँ आगाँ बढंल छथि जेना मैथिली साहित्यमे पहिने होइ छलै। प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि जे विदेह किए जातिवादी रंगमंचक विरोध करैए, किए समानान्तर परम्परा भ' क' मूल परम्पराक गुणवत्ताक समीक्षा करैए, समानान्तर तँ मूलसँ मिलित्े नै छै तँ किए हमर सभक नाम लै छी , अलग रहू, यएह छिऐ असल ब्राहम्णवाद- कायस्थवाद। चर्चे नै कर, काने बात नै दे!! आ ईहो संयोगे अछि जे जइ २-४ टा लोककेँ दिक़्क़त छन्हि से ब्राहम्णवादी प्रवृत्तक छथि, अनका ई दिक़्क़त किए नै छन्हि। पछिला ६ सालसँ विदेह जहिना छल ओहने रहत, अगिला कमसँ कम ३० साल धरि मैथिली साहित्य आब अहिना चलत। विदेहमे जकरा जे मेरिट छै ओ ओतेक बढ़त, चाहे ओ कोनो जाति, धर्म, क्षेत्रक होथि। विदेह जिनका बदलल लागि रहल छन्हि ओ स्वयंकेँ देखथु जे ओ तँ नै बदलि गेल छथि?
आब फेर आउ सगर राति दीप जरय पर।
अलिखित संविधानक नामपर बहुत रास खेल भेलै। ई मुख्य रूपेँ कथावाचनक गोष्ठी छिऐ मुदा एत' आलोचनात्मक आलेख पढ़बाक सेहो अनुमति छै आ से जँ अहाँक नाम रमण अछि तखने टा, से जखन कबिलपुर गोष्ठीमे मुन्नाजी विहनि कथा पर आलेख पढ़बाक अनुमति मांगलन्हि तँ से अनुमति नै भेटलन्हि, आ एत' अलिखित संविधानक सोंगर लेल गेल, आ तकर दूटा कारण , एक तँ मुन्नाजीक नाम रमण नै छियन्हि, दोसर विहनि कथाक कनसेप्ट विदेह द्वारा आगाँ बढ़ाओल जा रहल अछि से तकर विरोध, किए नै ओ कनसेप्ट कतबो वैज्ञानिक होइ।
झंझारपुर गोष्ठी मे जे एला तिनकर कथाक पाठ नै भेलन्हि मुदा डाकसँ आएल कथाक पाठ भेल, आ जँ अहाँ अविनाश छी सुमन-अमरकेँ गारि लिखै छी यात्रीक नामपर , तँ अहूँ कथाकार, कवि सभ , नै रहितो , छी, देवघर गोष्ठीक संयोजकत्व सेहो बोनसमे अहाँकेँ भेटत। से घोंघरडीहा गोष्ठीमे जिनका सभकेँ कथा नै पढ़' देल गेलन्हि, ओ सभ युवा एकर विरोध केलन्हि, किछुकेँ कथा पढ़' देल गेलन्हि आ जिनका नै पढ़' देल गेलन्हि से अगिला कथा गोष्ठीसँ एनाइ बन्द क' देलन्हि।
जे सभ मैथिली फिल्म आ डोक्यूमेण्टरीक नामपर लोकसँ पाइ ठकलन्हि से रमण- दरिहरे- बिहारीक विदेहक विरोधमे संगी छथि, जे युवा प्राइज़ लेल मैथिलीयोमे लिखना्हि, जातिवादी सभसँ मिलि साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कार लेलन्हि ओ तँ स्वाभाविक रूँपे हुनकर संगी हेता।
विदेह उमेश मण्डल आ जगदीश प्रसाद मण्डलक कान्हपर बंदूक राखने अछि, यूज़ क' रहल अछि, आ जँ हुनकर सभक रचना नै छप' देल जाइत, "तिल बहब ने" छपबासँ पहिने , सकरबाबल जाइत, तखन सभ ठीक छल। ब्राहम्णवादी सभ जेकाँ विदेह कोनो काज कएलासँ पहिने "तिल बहब ने"क शर्त क़रार नै करबैए आ सएह कारण अछि , नव ब्राह्मणवादी ई नै बूझि सकला, धू, एहनो क़तौ भेलैए। बिनु जान- पहिचान, भेंट- घांटक मात्र मैथिलीक नामपर सभ एकत्रित भ' गेल से हुनका अजगुत लगलन्हि।
प्रदीप बिहारी मुन्नाजीकेँ कहै छथि आ ई विचार रामदेव झाक सेहो छन्हि जे जखन विदेह साहित्य अकादेमीक समानान्तर पुरस्कार शुरू कैए देलक तखन साहित्य अकादेमी लेल शोर किए? माने ओकरा बकसि देल जाए! अशोक अविचल शिवकुमार जीकेँ कहै छथि जे मायानाथ झा, आनन्द कुमार झा ( ऐमे गुणनाथ झा जोड़ि लिअ) आदि जिनका सभक चर्चा विदेह केलक सभकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटलै, तँ हुनका उत्तर भेटल छलन्हि, जँ हुनकर सभक नाममे झा नै मण्डल रहितन्हि तँ की ई संभव छल?
आ साहित्य अकादेमी कोनो मनुक्ख नै छिऐ जकरा संग भतबरी कएल जाएत आ ने ककरो पैतृक संपत्ति जकर उपयोग ब्राहम्ण कायस्थक तथाकथित साहित्यकारकेँ ख़ैरात बँटबा लेल आब कएल जा सकत।
आ हमरा विषयमे जखन सभकेँ बुझबामे आबि गेलन्हि जे नै रौ, ई अपना सभ सन नै अछि, विदेह अपना सभ सन नै छौ, तँ हुनका सभ केँ आर चिन्ता लागि गेलन्हि! रौ कहीं, ईं हो सभ हमरे सभ सन, कहीन, ई जे अपने प्राइज़ लेब' चाहैए बा दोसराकेँ दिआब' चाहैए....
ब्राह्मणवाद मैथिलीकेँ गीरि गेलै, आ सभकेँ बुझल छै जे दूटा सहोदरो एक रंग नै होइए, से पूरा जाति नीक बा अधला हेतै ई कनसेप्ट विदेहक नै छै, ओ तँ ब्राह्मणवादी कनसेप्ट छिऐ।
अतुलेश्वर झा छथि ओना तँ ब्राहम्णवाादक विरोधमे रहथि मुदा पाग आ विद्यापतिक हमर लेख क बाद अलग भ' गेला़, आ एहेन बहुत रास लोक छथि, प्रेम चन्द्र पंकज आ अभय दासकेँ कोनो ने कोनो बात ल' क' विदेहसँ घृणा भ' गेलन्हि, आ ई गप ओ सभ मुन्नाजीकेँ सूचित केलन्हि जे ओ लोकनि विदेह पढ़नाइ आब छोड़ि देलन्हि, प्राय: आब ओ सभ चोरा नुका क' विदेह पढ़ै छथि, कारण सभ गतिविधिक जानकारी हुनका सभकेँ रहै छन्हि।
आब सगर राति पर आउ, यात्री दिससँ सुमन- अमर केँ गारि देनहार आ अमर- सुमन दिससँ यात्रीकेँ गारि देनहार, मैथिली साहित्यमे ब्राहम्णवाद बचेबाक लेल विदेहक विरुद्ध दरिहरे- रमण- बिहारीक संग आबि गेल छथि अंतिम लड़ाइ लड़बा लेल।


Tuesday, March 25, 2014

इति‍हास जेते साफ-सुथड़ा हुअए तेते नीक मुदा...

इति‍हास जेते साफ-सुथड़ा हुअए तेते नीक। मुदा साफ-सुथड़ाक माने ई नै जे सहीपर ओढ़नी ओढ़ा लेलौं, खास क' तखनि‍ जखनि‍ ओ अप्‍पन जाति‍क लोकक सवाल हुअए। अपन जाति‍क माने ई जे एकटा ओहेन धारा जइ धाराक अन्‍तर्गत सम्राज्‍यवादी अपन पैठ बनबैत रहल। जइसँ मैथि‍लाक आध्‍यात्‍मि‍क चि‍तंन दबाइत रहल। इति‍हासक बि‍न्‍दु ईहो हेबक चाही जे मि‍थि‍लामे आखि‍र ओ कोन धारा छि‍एे जइक चलतै ऐठामक लोक मौलि‍क कार्यसँ माने मनुखक जीवनसँ जुड़ल, वि‍काससँ जुड़ल काजसँ मि‍थि‍लाक लोककेँ सदति‍ अलग-थलग राखि‍ ओम्‍हर हुलकौल गेल आ हुलकौलो जा रहल अछि‍, जे ओइ सभसँ अलग अछि‍। अपना ऐठाम अखनो माए-बापक सेवा, समाजक सेवा, बुढ़ पुरानक सेवा, पछुआएल लोकक सेवा, बर-बेमारीमे सहायता इति‍यादि‍ मानवीय कार्य दि‍स हमरा सबहक नजरि‍ केते अछि‍ ओ स्‍वयं वि‍चारल जा सकैए। आइए जौं श्रुति‍ प्रकाशनक मालि‍क पोथी प्रकाशन कार्य क' आर्थिक रूपे पछुआएल साहि‍त्‍यकारक सहायता केलनि‍ तँ हुनका हम सभ के नजरि‍ए देखै छी? उलटे हुनका सभकेँ कखनो कोनो तँ कखनो कोनो छेबता लगा-लगा छेबैत रहै छि‍यनि‍!!! मुदा जौं वएह कोनो आन कार्य जे मानवीय कल्‍याणसँ हटल छै, जे मात्र भवलाेकमे महत रखैए, या फेर एकरा अहुना बूझल जाए जे ब्राह्मणवादी बेवहारसँ जुड़ल छै, कि‍छु लोकक मात्र ओइ कार्यसँ कल्‍याण हेते आ कल्‍याण की हेते जे आरो नोकसाने होइ छै आदि‍। खैर...। जौं नागेन्द्र झा-गजेन्‍द्र ठाकुर-ओम प्रकाश झा-अशीष अनचि‍नहार ओइ तरहक कार्यमे सहयोग केने रहि‍तथि‍ तखनि‍ फेर ठीक रहैत! आखरि‍ कि‍ए आ केना? हमरा सभकेँ ऐ रहसकेँ बूझब पड़त आ बूझि‍ इति‍हास लि‍खक चाही। ई बात तँ ठीक जे ज्‍योति‍रीश्वरकालि‍न मि‍थि‍ला आ आजुक मि‍थि‍लामे अन्‍तर आएल, सुधार भेल अछि‍। तइ दि‍नमे आरो स्‍थि‍त बि‍गड़ल छेलै। मुदा आइए गामे गाम केतौ नवाह कीर्तन तँ केतौ अष्‍टयाम, केतौ चण्‍डी यज्ञ तँ केतौ महा चण्‍डी यज्ञ इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। भतेरे ओहेन-ओहेन काज होइए जइसँ मि‍थि‍लाक चि‍तंन (आध्‍यात्‍मि‍क) पर केते धक्का लागि‍ रहल अछि‍ आ तइ लेल हम सभ के केते दोखी छी सेहो इति‍हासक वि‍षय बनए। जय मि‍थि‍ला, जय मैथि‍ली। -उमेश मण्‍डल

Monday, March 24, 2014

“सगर राति‍ दीप जरए” कथा गोष्‍ठीक मादे दू शब्‍द- :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल

“सगर राति‍ दीप जरए” कथा गोष्‍ठीक मादे दू शब्‍द-
:: जगदीश प्रसाद मण्‍डल

उदय-प्रलय शाश्वत सत् जहि‍ना छै तहि‍ना जि‍नगीओ आ जि‍नगीक कि‍रि‍या-कलाप सेहो छै। मैथि‍ली साहि‍त्‍याकाशमे बीसम शताब्‍दीक आठम दशक ओहने ऊर्जावान साहि‍त्‍यकारक टोली छल जेहेन वर्षातक पछाति‍ ओस-पाला, गर्दा-धूरासँ स्‍वच्‍छ वायुमंडलक संग अकास रहैए। एक संग हरि‍मोहन बाबू (हरि‍मोहन झा), तंतर बाबू (तंत्रनाथ झा), मधुपजी (काशीकान्‍त मि‍श्र ‘मधूप’), कि‍रणजी (काञ्चीनाथ कि‍रण), मणि‍पद्मजी (ब्रज कि‍शोर वर्मा ‘मणि‍पद्म’), शेखरजी (शुधांशु शेखर चौधरी), योगाबाबू (योगानन्‍द झा), राघवाचार्यजी, (बोध नारायण झा), बहेड़जी (राधाकृष्‍ण झा ‘बहेड़’) आ राधाकृष्‍ण चौधरीजी सन मैथि‍ली साहि‍त्‍यकाशमे दुनि‍याँक सभ दि‍शा देखि‍नि‍हार छला। दार्शनि‍क रहि‍तो हरि‍मोहन बाबूकेँ मैथि‍ली साहि‍त्‍य हास्‍यसँ आगू नै बढ़ए देलकनि‍! एकैसम शदीक मांग अछि‍ जे हुनक समीक्षा मि‍थि‍लाक चि‍न्‍तनधारा, अध्‍यात्‍म दर्शनक कसौटीपर हुअए। तहि‍ना राधाकृष्‍ण जीक इति‍हासक मूल तत्‍वक सेहो। चौधरी जीक इति‍हास समाजमे पाठकक बीच एक नव सोच आ नव दृष्‍टि‍ दैत अछि‍ तँए ओइ दृष्‍टि‍सँ हुनका देखल जाए। भऽ सकैए कि‍छु पोथी हाथ नै पड़ल होन्‍हि‍, मुदा इति‍हासो तँ इति‍हासे छी। जे अखनि‍ तक रज-रजवारासँ आगू नै बढ़ल अछि‍, तैठाम इति‍हासक पूर्णता देखब उचि‍त नै। दुर्भाग्‍य रहल अछि‍ जे अखनि‍ धरि‍क इति‍हास सामाजि‍क ताना-बानाकेँ नीक जकाँ नै ताकि‍ सकल अछि‍। अखनो मि‍थि‍लाक खान-पान आ घर-दुआर अपन आदि‍म स्‍वरूपकेँ बँचौने अछि‍। मात्र देखैक नजरि‍क जरूरत अछि‍। जे मधुपजी पोरो सागकेँ देखि‍ सकै छथि‍ ओ साग खेनि‍हारकेँ नै देखि‍ पबि‍तथि? रहस्‍यमय अछि‍। कि‍रणजी तँ सहजे मैथि‍लीक कि‍रणे छला‍। कठही पैडि‍लक साइकि‍लपर शतरंजी चौपेतले रहै छेलनि‍। शरदक चान जकाँ चमकैत सोभाव। मात्र चाहपर अभ्‍यागती! बीचमे एकटा प्रश्न उठैए, ओहेन टोली आइ कि‍ए ने? साहि‍त्‍यजगतमे जागरण छल, समाजक बीच जि‍ज्ञासा छल जे कि‍ साहि‍त्‍य हमरो छी। कि‍रण जीक स्‍पष्‍ट कहब छेलनि‍, जहि‍ना बजै छी तहि‍ना लि‍खू, जहि‍ना समाजकेँ देखै छि‍ऐ तेहने वि‍षय बनाउ, वएह भेल साहि‍त्‍य। जेहने वि‍चार कि‍रण जीक रहनि‍ तेहने वि‍चार राहुल सांकृत्‍यायन जीक सेहो रहनि‍। हुनको कहब छन्‍हि‍ अपन बात आन आ आनक बात अपने नीक जकाँ बूझि‍ जाइ, वएह भेल ओइ भाषाक व्‍याकरण। भाषाक धाराक अंग भेल शब्‍द। भाषाक धारा ओइसँ वृहत अछि‍। आन भाषा केना आन भाषामे प्रवेश करैए ओ अलग प्रक्रि‍या भेल। मणि‍पद्मजी, सचमुच साहि‍त्‍यक मर्म बूझि‍नि‍हार मणि‍पद्म भेला। ओना अपनो जि‍नगीक अनुभव आ दरभंगा जि‍लाक पुबरि‍या हि‍स्‍साक अखनो कि‍ गति‍ अछि‍ ओइ अनुकूल हुनक सृजन छन्‍हि‍। बेछप साहि‍त्‍यकार। एकभग्‍गू कवि‍ए मात्र नै छला, लोकगाथाक मर्म बुझि‍नि‍हारो छला। आठम दशक उर्वर होइक कारण यएह सभ छला। जहि‍ना आठम दशकक उर्वरता छल तहि‍ना नअम दशक उसराह बनैत गेल, बनि‍येँ गेल। मुदा तैयो साहि‍त्‍यक धार बहि‍ते रहल अछि‍। एकटा बात आरो, आठम दशक ओहेन रहल, जइमे गाम-गाममे हराएल-भुति‍आएल कि‍छु साहि‍त्‍यकार सेहो भेटला। मुदा अखनो बहुत हराएल छथि‍। कि‍छु हेराएलो गेला।
सगर राति‍ दीप जरए, कथा गोष्‍ठीक आयोजनक अवधारणाक जनम कि‍रण जीक जयन्‍तीक अवसरि‍पर लोहना (धर्मपुर)मे एकत्रि‍त साहि‍त्‍यकारक बीच भेल। मुदा साकार भेल प्रभास कुमार चौधरी जीक माध्‍यमसँ। एकटा बात बीचमे, कि‍रणजी सन खोद-बेद केनि‍हारक अवसरि‍ दोसर प्रभासजीक स्‍थापना। बेछप जि‍नगी, बेछप सोच, बेछप सृजन, बेछप नजरि‍ प्रभास जीक। असीम जि‍ज्ञासाक संवेदना रग-रगमे रमल छेलनि‍। जेकर परि‍चए जीवंत रचना अखनो दाइए रहल छन्‍हि‍। साहि‍त्‍यकारक बीच सहमत बनल जे जहि‍ना पंजाबी सहि‍त्‍यमे ‘दीवा जले सारी रात’ कथा गोष्‍ठी भरि‍ राति‍क होइए, तहि‍ना मैथि‍लीओमे हुअए। नव उत्‍साह नव जि‍ज्ञासाक संग प्रभास भाय डेग उठौलनि‍। मनमे छेलनि‍ जे साहि‍त्‍यि‍क धारा समाजक संग चलए। मुदा कि‍छुए साल पछाति‍ मरि‍ गेला।
पहि‍ल कथा गोष्‍ठीक आयोजन मुजफ्फरपुरमे भेल। ओतए प्रभासजी नोकरी करै छला। रेणु जीक अध्‍यक्षतामे गोष्‍ठी भेल। रेणुजी सेहो समाजकेँ नि‍ष्‍पक्ष ढंगसँ देखै छला। तइ दि‍नसँ अखनि‍ धरि‍क कथा गोष्‍ठी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक धरोहर पूजी छी। एक तँ कथा गोष्‍ठी दोसर साहि‍त्‍यक मुख्‍य वि‍धा। तँए पहि‍ल संतोनो कहल जा सकैए।
पहि‍ल कथा गोष्‍ठी जनवरी १९९० इस्‍वीमे भेल। पहि‍ल गोष्‍ठीमे कथापाठ केने रहथि‍, रमेशजी- “थाक”, श्रीनि‍वासजी (शि‍व शंकर श्रीनि‍वास)- “वसातमे बहैत लोक”, वि‍भूति‍ आनन्‍दजी- “अन्‍यपुरुष”, अशोक जी- “पि‍शाच”, सि‍याराम सरस जी- “ओहि‍ साँझक नाम”, प्रभासजी- “खूनी”, रवि‍न्‍द्र चौधरीजी सेहो कथा पाठ केलनि‍। तैबीच डा. नन्‍द कि‍शोर जे एल.एस. कौलेजक नीक शि‍क्षक, हि‍न्‍दीमे कथा पाठ केलनि‍। मुदा दुर्भाग्‍य ईहो जे ओ मैथि‍लीभाषी रहि‍तो हि‍न्‍दीमे पाठ केलनि‍। समीक्षको छथि‍। कथाक समीक्षक रूपमे कथाकरक संग रमानन्‍द झा ‘रमण’जी, भीम भाय (भीमनाथ झा), मोहन भारद्वाजजी, जीवकान्‍त, कथा पाठ जीवकान्‍त केलनि‍ आकि‍ नै से जनतबमे नै अछि‍। इत्‍यादि‍ समीक्षकक संग कि‍छु दर्शको रहबे करथि‍।
तेसर कथागोष्‍ठीसँ पोथीक लोकार्पण शुरू भेल, जे बढ़ैत-बढ़ैत दरभंगा गोष्‍ठी शीर्षपर पहुँच गेल। एक संग पौंतीस-चालि‍सटा पोथीक लोकार्पण। निर्मली कथा गोष्‍ठीसँ पूर्व धरि‍ शीर्षपर रहल। निर्मली गोष्‍ठीमे पैंतालि‍‍स-पचासटा पोथीक लोकार्पण भेल। कथा गोष्‍ठीसँ कथाधारामे एक गति‍ आएल, नव-नव रचनाकारक प्रवेश गोष्‍ठीमे होइत रहल, गोष्‍ठी आगू बढ़ैत रहल। मुदा गोष्‍ठीक बीच एकरूपता नै रहल, केतौ एहेन आयोजन भेल जे साँझसँ भोर भेलो पछाति‍ कथाकारक कथा रहि‍ जाइ छन्‍हि‍ तँ केतौ अधरति‍येमे बेवस्‍थापक चाह-पान समेटि‍ लइ छथि‍, खैर जे भेल। साहि‍त्‍य गोष्‍ठी साहि‍त्‍यकारक मंच छी। जइ मंचपर सभकेँ अपन वि‍चार रखैक हक छन्‍हि‍। जखनि‍ सभ कि‍यो मि‍थि‍लाक वि‍कास चाहै छी तखनि‍ मत-मतान्‍तर कि‍ए? कथा गोष्‍ठीक संग कथा-वि‍चार मंचोक तँ जरूरति‍ अछि‍ए। लि‍खैक मानदण्‍ड, समीक्षाक मानदण्‍ड के बनौत? समयानुकूल दृष्‍टि‍ए तँ समसामयि‍के ने जि‍म्मा भेल। समसामयि‍क रचनाकारक रचनाकेँ स्‍तरानुसार सि‍लेबसमे स्‍थान आवश्‍यक अछि‍।     
दुनि‍याँमे पैघ-पैघ शि‍क्षण संस्‍थान जनसहयोगसँ चलि‍ रहल अछि‍, की अपना ऐठाम नै चलि‍ सकैए? एकटा वि‍श्ववि‍द्यालय अछि‍, रेडि‍यो स्‍टेशन अछि‍, ओ केना नीक जकाँ बढ़ि‍ सकए, सबहक जि‍म्‍मा भेल। एकटा वि‍श्ववि‍द्यालय अछि‍, जे सोलहन्नी सरकार दि‍स तकैए, तहूमे लूटि‍क बाढ़ि‍ छइहे, तइसँ केते आशा कएल जा सकैए। मि‍थि‍लामे पाइबला शि‍क्षण प्रेमी नै छथि‍, सेहो बात नै अछि‍। गजेन्‍द्र जीक (गजेन्‍द्र ठाकुर) सम्‍पादनमे नागेन्‍द्र जीक (नागेन्‍द्र झा, श्रुति‍ प्रकाशन) सहयोगसँ केते पोथी प्रकाशि‍त भेल अछि‍ ओ अपने-आपमे एकटा उदाहरण अछि‍। ओना बेक्‍तीगत रूपमे गजेन्‍द्रजीकेँ केना बि‍सरल जाए जे टैगोर पुरस्‍कारमे एँड़ी-चोटी एक केने छथि‍। कोंचि‍न जाइकाल पटना एयरपोर्टपर अपन गाड़ीसँ पहुँचा सभ कि‍छु देखा-सुना दुर्गानन्‍द मण्‍डलक संग वि‍दा केलनि‍। स्‍पष्‍ट सोच छन्‍हि‍ जे आर्थिक दृष्‍टि‍ए कमजोर रचनाकार लोकनि‍क रचना प्रकाशि‍त करब। से करबो केलनि‍ आ करि‍तो छथि‍।

अन्‍तमे, बेवस्‍थापक ओम बाबू (ओम प्रकाश झा) निर्मली गोष्‍ठीमे अपन गजल संग्रह नेने लोकार्पण करबए पहुँचला। ओना कि‍छु-कि‍छु पहि‍नौंसँ बूझल छल मुदा चेहरा देखि‍ झुझुआ गेलौं। कि‍छु करैक जि‍ज्ञासा तँ मनमे छन्‍हि‍हेँ। अगि‍ला बात आगू, अखनि‍ तँ अशे धरि‍। अन्‍तमे, अन्‍हरा-अन्‍हरी माए-बापकेँ कन्‍हेठ जहि‍ना श्रवणकुमार चारू धाम देखबए वि‍दा भेला तही आशाक संग अपन दू शब्‍दमे वि‍राम लगबै छी। धैनवाद! जय मैथि‍ली।mmm